Wednesday, December 30, 2009

तेलंगाना को लेकर आंध्र की राजनीति में उबाल

तेलंगाना मामले ने वर्ष 2009 के अंत में आंध्रप्रदेश की राजनीति में तूफान ला दिया और यही मुद्दा कांग्रेस के गले की हड्डी बन गया। कांग्रेस कोई ऐसा तरीका खोजने में लगी है, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। इसी साल राज्य ने करिश्माई मुख्यमंत्री वाइ एस राजशेखर रेड्डी को एक हेलीकाप्टर दुर्घटना में खो दिया। राज्य से कांग्रेस ने इस साल अप्रैल मई में हुए लोकसभा चुनावों में रेड्डी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सांसदों को केंद्र में भेजा और राज्य विधानसभा में भी सफलतापूर्वक सत्ता हासिल की। राज्य विकास के पथ पर अग्रसर हो ही रहा था कि रेड्डी के असमय निधन ने बहुत कुछ उलटफेर कर दिया। तीन सितंबर को कुरनूल की पहाडि़यों के पास नल्लामाला के जंगल में एक हेलीकाप्टर हादसे में रेड्डी मारे गए। इसके बाद राज्य एक के बाद एक संकट में घिरता गया और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती रही। राज्य के हालात सामान्य करने का जिम्मा वरिष्ठ कांग्रेस नेता के रोजैया को सौंपा गया लेकिन वे पार्टी की अंदरूनी कलह में घिर गए क्योंकि दिवंगत मुख्यमंत्री रेड्डी के समर्थक उनके पुत्र जगनमोहन को सत्ता की बागडोर देने की मांग कर रहे थे। राज्य में लगभग दो माह तक कांग्रेस मुख्यमंत्री के मुद्दे पर विभाजित रही। एक ओर रोजैया और दूसरी ओर जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठ रही थी। आखिरकार पार्टी आलाकमान रोजैया को मुख्यमंत्री बनाने के लिए विद्रोहियों को मनाने में सफल रहा।इससे पहले कि रोजैया सब कुछ ठीक कर पाते, उन्हें पृथक तेलंगाना राज्य बनाने की मांग से दो चार होना पड़ गया। इस राजनीतिक संकट ने राज्य को क्षेत्रीय आधार पर बांट दिया और बड़े राजनीतिक दिग्गजों ने भी खुद को हाशिए पर पाया। कांग्रेस में इस मुद्दे पर खुल कर मतभेद उभरे। तेदेपा ने इस मुद्दे का विरोध किया। मुख्य विपक्षी दल प्रजाराज्यम का तेलंगाना में आधार ही खत्म हो गया और पार्टी प्रमुख अखंड राज्य को समर्थन के अपने रूख से पलटते नजर आए। अलगाववादी तेलंगाना राष्ट्र समिति के लिए यह मुद्दा ''करो या मरो'' की स्थिति ले कर आया। तेलंगाना मुद्दा कांग्रेस के गले की हड्डी बन गया और उसने यह कहते हुए इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया कि इस बारे में आम सहमति बनाने के लिए राजनीतिक दलों के साथ व्यापक विचार विमर्श करना होगा। साल की शुरूआत राज्य में विधानसभा चुनावों के साथ हुई। कांग्रेस 155 सीटें हासिल कर किसी तरह सरकार बनाने में सफल रही। तेदेपा ने 294 सदस्ईय विधानसभा में 92 सीटें जीत कर दमदार वापसी की। चिरंजीवी की पार्टी को मात्र 18 सीटें मिलीं। टीआरएस केवल दस विधानसभा सीटों पर सिमट गई। उसे लोकसभा चुनावों में केवल दो सीटें मिलीं। तेजी से जनाधार खोती टीआरएस को उसके प्रमुख के चंद्रशेखर राव ने मजबूत करने की कोशिश की और पृथक तेलंगाना की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गए। लेकिन राज्य की राजनीति में उबाल लाने वाला यह मुद्दा फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया।

जाते बरस में इतिहास बन गई बहुत सी बातें

अपने 365 दिनों के सफर के आखिरी दिन में पहुंच चुके वर्ष 2009 में कई ऐसी हस्तियां हमसे हमेशा के लिए दूर चली गयीं जिन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता। इतिहास के पन्नों पर इनके अमिट हस्ताक्षर दर्ज हैं और पीछे रह गई हैं सिर्फ यादें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता तपन सेन का कोलकाता में 15 जनवरी को 84 साल की उम्र में निधन हो गया। उनकी उल्लेखनीय हिंदी फिल्में जिंदगी जिंदगी, सगीना, एक डाक्टर की मौत तथा डॉटर्स ऑफ द सेंचुरी हैं। भारत के आठवें राष्ट्रपति आर वेंकटरामन का 27 जनवरी को निधन हो गया। उन्होंने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था। देश के प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम की पहल करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। 22 फरवरी को ब्रिटिश रियलिटी शो की स्टार जेड गुडी का कैंसर से निधन हो गया। रियलिटी शो 'बिगब्रदर' की, बालीवुड की अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी पर जेड गुडी की नस्ली टिप्पणी के बाद बहुत चर्चा हुई और ब्रिटिश संसद में भी इसकी गूंज हुई थी। बाद में जेड गुडी को माफी मांगनी पड़ी थी। 'कटी पतंग', 'अमर प्रेम', 'अराधना' जैसी यादगार फिल्में सिने प्रेमियों को देने वाले निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत का मुंबई में आठ अप्रैल को निधन हो गया। बॉलीवुड में खास शैली और अलग अंदाज रखने वाले अभिनेता, निर्माता, निर्देशक फिरोज खान का 27 अप्रैल को कैंसर से निधन हो गया। कुर्बानी, जांबाज और दयावान जैसी 50 से अधिक फिल्मों में अभिनय के जौहर दिखाने वाले फिरोज खान की अन्य उल्लेखनीय फिल्में आदमी और इन्सान, अपराध, उपासना, मेला, आग आदि हैं।चित्रकला के क्षेत्र में भारत को अनूठी पहचान देने वाले प्रख्यात चित्रकार तैयब मेहता का तीन मई को मुंबई में 84 साल की उम्र में देहांत हो गया। वर्ष 2007 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। बॉलीवुड के मेगास्टार अमिताभ बच्चन को पहली हिट फिल्म ''जंजीर'' देने वाले निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा का मुंबई में 17 मई को निधन हो गया। उनकी अन्य हिट फिल्मों में नमकहलाल, शराबी और लावारिस प्रमुख हैं। प्रख्यात लेखिका कमला सुरैया का पुणे के अस्पताल में 31 मई को देहांत हो गया। उनके अंग्रेजी और मलयालम लेखन को पाठकों ने खूब सराहा था। छत्तीसगढ़ की अनूठी आदिवासी संस्कृति को रंगमंच के माध्यम से से दुनिया को परिचित कराने वाले प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर का आठ जून को निधन हो गया। रंगकर्म के पर्यायवाची कहे जाने वाले तनवीर ने अपनी अमर कृति चरण दास चोर के माध्यम से दुनिया को छत्तीसगढ़ की झलक दिखाई। पॉप किंग माइकल जैक्सन का लॉस एंजिलिस में 26 जून को निधन हो गया। 80 के दशक में अपने ब्रेक डांस से लोगों को झूमने पर मजबूर करने वाले तथा अपने संगीत से लाखों दिलों को अभिभूत करने वाले जैक्सन का देहांत उनकी बहुप्रतीक्षित वापसी ''दिस इज दैट'' से कुछ ही हफ्ते पहले हुआ। हुबली में 21 जुलाई को प्रख्यात हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गायिका और ''किराना घराना'' की गंगू बाई हंगल का 97 साल की उम्र में देहांत हो गया। 'अनुराधा' और 'ए रास्ते हैं प्यार के' जैसी फिल्मों में अपनी खूबसूरती और अभिनय से दर्शकों की वाहवाही लूटने वाली अभिनेत्री लीला नायडू का लंबी बीमारी के बाद मुंबई में 28 जुलाई को 69 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।वर्ष 1955 में मिस इंडिया का खिताब जीतने वाली लीला का नाम वोग पत्रिका में 'दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं' की सूची में जयपुर की पूर्व महारानी एवं राजमाता गायत्री देवी के साथ प्रकाशित हुआ था। अगले ही दिन 29 जुलाई को गायत्री देवी का जयपुर में लम्बी बीमारी के बाद 90 साल की उम्र में निधन हो गया। गायत्री देवी जयपुर की तीसरी महारानी थी और सवाई मान सिंह :द्वितीय: की पत्नी थीं। ब्रिटिश प्रेस ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए ऐसी भारतीय महारानी बताया, जिनका जीवन 'राज' के ग्लैमर और रोमांस को समेटे हुए है। फिलीपींस की पूर्व नेता तथा लोकतांत्रिक प्रतीक मानी जाने वाली कोरैजन अकीनो का मनीला में 76 साल की उम्र में एक अगस्त को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। अकीनो ने 1986 में ''पीपुल पावर'' :जनशक्ति: नाम से व्यापक आंदोलन चलाया जिससे दिवंगत तानाशाह फर्दिनंद मारकोस का तख्ता पलट गया था। सात अगस्त को मुंबई में गीतकार गुलशन बावरा का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उन्होंने 42 साल के फिल्मी सफर में जंजीर का 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी' तथा उपकार का 'मेरे देश की धरती सोना उगले' जैसे अमर गीत लिखे। भारत के धुर समर्थक और अमेरिका के जाने माने डेमोक्रेट सीनेटर एडवर्ड एम कैनेडी का दिमागी कैंसर के कारण 25 अगस्त को 77 वर्ष की उम्र में अमेरिका के मैसाच्यूसेट्स के ह्यानिस पोर्ट में निधन हो गया। एडवर्ड अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के छोटे भाई थे।ऊंची उपज और अधिक प्रतिरोधक क्षमता की गेहूं किस्म विकसित कर 'हरित क्रांति' की नींव रखने वाले नोबेल पुरस्कार प्राप्त मशहूर अमेरिकी वैज्ञानिक नोरमैन बोरलॉग का 12 सितंबर को 95 वर्ष की उम्र में अमेरिका के टैक्सास में निधन हो गया। हरित क्रांति के चलते ही भारत में गेहूं का उत्पादन दुगना हुआ था और विकासशील देशों में अकाल को रोकने में मदद मिली थी। बोरलॉग को 1970 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया था। कृषि के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। उनकी कृषि तकनीक से देश को मोटे अनाज के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिली थी। अपने जीवनकाल में 25 लोगों को फांसी पर चढ़ाने वाले जल्लाद नाटा मलिक का कोलकाता में 14 दिसंबर को 89 साल की उम्र में निधन हो गया। करीब पांच साल पहले मलिक ने बलात्कार और हत्या के दोषी धनजंय चटर्जी को फांसी पर लटकाया था। मलिक ने 1970 के दशक में मृणाल सेन की फिल्म 'मृगया' में जल्लाद की भूमिका निभाई थी। उन्होंने टेलीविजन कार्यक्रमों और रंगमंच में भी अपने अभिनय से लोगों का भरपूर मनोरंजन किया। 'अनारकली' और 'ताजमहल' जैसी फिल्मों में निभाए अपने किरदार के लिए मशहूर अदाकारा बीना राय का छह दिसंबर को दिल का दौरा पड़ने से 78 साल की उम्र में निधन हो गया। फिल्मफेयर अवार्ड विजेता बीना राय दिवंगत अभिनेता प्रेमनाथ की पत्नी थीं।
वर्ष 2009 विदा लेने को है। इस वर्ष कई योजनाओं और परियोजनाओं को पूरा किया गया तो कुछ को हमेशा के लिए बंद करने का भी फैसला किया गया। कुछ चीजें दुर्घटनावश भी नष्ट हो गयीं। आने वाले वर्ष के लिए यह सब अतीत की बातें होंगी। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में दिखने वाली उड़नतश्तरियां अभी भी एक गुत्थी बनी हुई हैं, लेकिन ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने खर्च में कटौती उपाय के तहत अपनी उड़नतश्तरी हॉट लाइन को इस साल दिसंबर से बंद कर दिया है। वह अब इस तरह की वस्तुओं के दिखने के मामलों की जांच पड़ताल नहीं करेगी। दिसंबर के पहले सप्ताह में मंत्रालय के हॉट लाइन और इसके ईमेल खाते को बंद किया जाना ब्रिटेन के उन कई लोगों की नाराजगी का कारण बन गया जो मानते हैं कि इस तरह का शोध महत्वपूर्ण कार्य है। उत्तरी नीदरलैंड में रखी गई डच ईस्ट इंडिया कंपनी के एक जहाज की 17वीं सदी की एक प्रतिकृति अब नजर नहीं आएगी क्योंकि 30 जुलाई को यह जलकर राख हो गई। यह जहाज 1980 में कई वर्षो तक जापान के नागासाकी में रहा। वर्ष 2003 में नीदरलैंड के उत्तरी बंदरगाह डेन हेल्डर में लौटा था और तब से वह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र था। मूल जहाज का निर्माण 1649 में हुआ था। वह डच व्यापारिक कंपनी का सबसे बड़ा जहाज था। 1662 में यह जहाज मेडागास्कर के पास डूब गया था। फिर इसकी प्रतिकृति बनाई गई थी।ब्रिटेन में 30 जुलाई को एक ऐतिहासिक घटना हुई। इस दिन देश में सुप्रीम कोर्ट के गठन के साथ ही हाउस ऑफ लॉर्ड्स का मुल्क की सबसे बड़ी अपीलीय अदालत का दर्जा खत्म हो गया। हाउस ऑफ लॉर्ड्स पिछली शताब्दियों से देश की सर्वोच्च अदालत थी लेकिन लॉ लॉर्ड्स के वेस्टमिंस्टर में सुप्रीम कोर्ट में कामकाज सम्भालने के बाद स्थिति बदल गई। सुप्रीम कोर्ट का गठन देश की गोर्डन ब्राउन सरकार के संसदीय सुधार कार्यों का हिस्सा है। मुल्क में उच्चतम न्यायालय के गठन सम्बन्धी कानून वर्ष 2005 में पारित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में तब्दील होने की ऐतिहासिक घटना से ऐन पहले हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने अपने पास लम्बित आखिरी अपीलों पर 30 जुलाई को सुनवाई की। ब्रिटेन में एक सितंबर से घरेलू उपयोग में आने वाले 100 वाट के बल्बों के उत्पादन और आयात पर प्रतिबंध लग गया। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से आए यूरोपीय संघ के निर्देशों में संघ के सभी सदस्य देशों में 100 वाट के बल्बों के आयात पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। ऐसे बल्बों की बिक्री सिर्फ मौजूदा स्टॉक के खत्म होने तक जारी रही।

जाते बरस में इतिहास बन गई बहुत सी बातें

पक्का इरादा ही जीत के जज्बे का जीवन रक्त है

कामयाबी और हमारे बीच सिर्फ एक दृढ़ संकल्प का फासला होता है। पक्का इरादा ही जीत के जज्बे का जीवन रक्त है और दृढ़ निश्चय करने का मतलब है कि आप मंजिल पाने की आधी जंग जीत चुके हैं। पक्के इरादे ने महात्मा गांधी को भारत की जनता में अहिंसा जैसे मुश्किल रास्ते के जरिए आजादी की अलख जगाने में निर्णायक भूमिका अदा की। दृढ़ निश्चय ने ही बराक ओबामा को अमेरिका का पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनकर इतिहास रचने की ताकत दी और नकारात्मक रूप से ही सही लेकिर पक्के इरादे ने ही हिटलर को इतना ताकतवर बनाया कि उसकी धमक से सारी दुनिया हिल गई। प्रख्यात विचारक नॉर्मन विंसेट पील की मशहूर किताब 'द पॉवर ऑफ पॉजिटिव थिंकिंग' के मुताबिक पक्का इरादा ही जीत की प्रेरणा और मंजिल को पाने की ललक का एकमात्र आधार होता है। सारा फर्क दृढ़ निश्चय का ही होता है। अगर यह है तो सब कुछ है और अगर यह नहीं है तो कुछ भी नहीं है। दक्षिण अफ्रीका के पीटरमारित्जबर्ग में प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद तीसरी श्रेणी में सफर करने से इनकार के बाद रेलवे प्लेटफार्म पर तिरस्कारपूर्ण ढंग से फेंके गए मोहनदास करमचंद गांधी ने इस भेदभाव को दूर करने का पक्का इरादा किया और उसी निश्चय के बल पर उन्होंने दुनिया बदल डाली।अमन से जीना है तो जंग के लिए तैयार रहो, लेकिन महात्मा गांधी की अहिंसा की विचारधारा ने हिंसा को ही समाधान का रास्ता मानने की व्याप्त सोच में बदलाव किए। बेशक इसके लिए उनका संकल्प ही सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति था। बराक ओबामा की अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की गाथा भी पक्के इरादे के इर्द-गिर्द घूमती है। ओबामा ने कभी अश्वेतों को दोयम दर्जे का नागरिक समझने वाले देश अमेरिका का पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनकर इतिहास रचा। वैश्विक आर्थिक मंदी की मार झेल रहे अमेरिका को मुश्किल से उबारने के लिए एक ऐसे नेता की जरूरत थी जो आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय से लबरेज हो। ओबामा ने मंदी के निवारण के लिए अपने दृढ़ निश्चय को अपने लोकप्रिय वाक्य 'यस वी कैन' में तब्दील करके अपनी जीत की इबारत लिख दी। पक्का इरादा ही विश्व इतिहास के सबसे बड़े खलनायक माने जाने वाले हिटलर की सबसे बड़ी खासियत थी। माना जाता है कि किसी भविष्यवक्ता ने उसका हाथ देखकर कहा था कि उसकी हथेली में राजयोग की रेखा नहीं है। इस पर उसने धारदार चीज से हथेली काटकर वह रेखा बना ली थी। एक साधारण सरकारी कर्मी से जर्मनी के तानाशाह तक का सफर करने वाले हिटलर को दुनिया अच्छी नजरों से नहीं देखती लेकिन उसके दृढ़ संकल्प का लोहा दुनिया कहीं न कहीं आज भी मानती है। यह सत्य है कि हमारे और मंजिल के बीच सिर्फ एक पक्के इरादे का फासला होता है और यह दृढ़ निश्चय ही व्यक्ति को साधारण से महान बनाने की पहली सीढ़ी बनता है।

Tuesday, December 29, 2009

कभी खुशी कभी गम भरा रहा बसपा के लिए यह साल

दो वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश की सत्ता में पूर्ण बहुमत से काबिज होने वाली बहुजन समाज पार्टी ने इस वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में अपनी सुप्रीमो मायावती के लिए प्रधानमंत्री का ख्बाब देखा जो पूरा न हो सका परन्तु विधानसभा के उपचुनावों में आशातीत सफलता हासिल मिलने के बाद पार्टी के लिए यह वर्ष 'कभी खुशी कभी गम' जैसा रहा। अमेरिका के साथ हुई परमाणु संधि के कारण केन्द्र की सप्रंग सरकार से चुनावी वर्ष में अपना पल्ला झाड़ चुकी बसपा ने तीसरे मोर्चे से हाथ मिलाया और वामपंथी दलों ने मायावती को प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल करने का ऐलान करते हुए बसपा की आंखों में एक खूबसूरत सपना दे दिया। मायावती को प्रधानमंत्री का सपना दिखाकर वामपंथी दल भले ही पीछे हट गए लेकिन बसपा ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती को प्रधानमंत्री के रुप में पेश करते हुए हवा में यह नारा भी उछाल दिया 'यूपी हुई हमारी, अब दिल्ली की बारी।' वर्ष 2007 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 403 सीटों में से 216 सीटें जीतने के बाद बसपा के रणनीतिकार वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कम से कम 55 से 60 सीटें जीतने की उम्मीद बांधे हुए थे। उन्हें पूरा भरोसा था कि दलित वोट बैंक और सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के साथ साथ सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से खफा मुसलमान को अपने साथ जोड़कर उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई लोकसभा सीटें जीती जा सकती हैं, पर पासा उल्टा पड़ गया।बसपा के रणनीतिकारों का मायावती को प्रधानमंत्री बनाने का सपना तो पूरा हो न सका उल्टे पार्टी को 21 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। अपने टूटे फूटे संगठनात्मक ढांचे को लेकर दो दशकों से प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर रही कांग्रेस ने बसपा सुप्रीमो के प्रधानमंत्री बनने तथा 'सत्ता की चाभी' हासिल करने के दोनों सपनों को तोड़ दिया और सपा मुखिया मुलयाम सिंह यादव से छिटके मुसलमानों के मत अपनी ओर खींच लिए। कांग्रेस ने बसपा के दलितों वोट बैंक में भी सेंध मारी जिससे बसपा को काफी नुकसान पहुंचा। देश की सत्ता पर काबिज हो पाने में असफल बसपा सुप्रीमो मायावती ने लोकसभा परिणामों के बाद बडे़ रोष भरे शब्दों में कहा कि सभी राजनीतिक दल एक दलित की बेटी को प्रधानमंत्री के पद पर नहीं देखना चाहते। वर्ष 2009 के अंत में हुए विधानसभा के उपचुनाव में भारी सफलता ने बसपा का हौसला बुंलद कर दिया। इन चुनावों बसपा ने सपा के गढ़ में सेंध मारी और कांग्रेस के दो केन्द्रीय मंत्रियों के क्षेत्रों में भी अपनी विजय पताका फहराई। विधानसभा उपचुनाव के पहले तीन और बाद में 11 सीटों पर हुए उपचुनावों में बसपा ने क्रमश: दो और नौ सीटों पर सफलता हासिल की। विधानसभा के उपचुनावों से पहले बसपा की विधानसभा में 216 सीटें थीं। उपचुनावों में 11 सीटों पर फतह हासिल कर उसकी विधानसभा में सीटों की संख्या 227 हो गई। उत्तर प्रदेश से बाहर अपना विस्तार करने के प्रयास में बसपा ने इस साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड सहित अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े किए।पार्टी सुप्रीमो मायावती ने ताबड़तोड़ चुनावी रैलियां करके पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लेकिन हरियाणा को छोड़कर किसी अन्य प्रदेश में पार्टी अपना खाता खोलने में नाकाम रही। हरियाणा में बसपा ने एक सीट जीती लेकिन उसके इकलौते विधायक ने पार्टी से किनारा करते हुए हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। बहरहाल, बसपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित कुछ राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कुछ स्थानों पर स्थानीय निकायों के चुनावों में पहली बार जीत दर्ज की। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी द्वारा मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ मुरादाबाद मे भड़काऊ भाषण देने के बाद कथित बसपा समर्थकों ने डा. जोशी के लखनऊ स्थित आवास पर आगजनी की जिससे बसपा की छवि को धक्का लगा। विपक्ष के दबाव में राज्य सरकार ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी। इस पूरे मामले में सीबीआई जांच की मांग करते हुए कांग्रेस ने सरकार पर हमला जारी रखा। पिछले वर्ष 2008 दिसम्बर में औरेया जिले में हुए अभियंता मनोज गुप्ता हत्याकांड मामले में मुख्य अभियुक्त बसपा विधायक शेखर तिवारी के शामिल होने और पकड़े जाने तथा उन पर मुकदमें की कार्रवाई वर्ष 2009 में चलती रही। बसपा सरकार के लिए वर्ष 2009 का एक बड़ा झटका यह भी रहा जब 18 सितंबर को लखनऊ में कांशीराम स्मारक स्थल पर निर्माण रोकने के हलफनामे का उल्लंघन करने के मामले में मायावती सरकार की दलील पर उच्चतम न्यायालय ने असंतोष जाहिर करते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियों पर रोक जारी रहेगी। स्मारक में निर्माण कार्य रोक दिया गया।वर्ष 2009 में बसपा में आने और बाहर निकाले जाने वालों का ताता लगा रहा। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सपा के कई कद्दावर नेताओं ने मुलायम सिंह का साथ छोड़कर मायावती की बसपा का दामन थाम लिया। इनमें राज्यसभा के सदस्य शाहिद सिद्दीकी और बनवारी लाल कंछल शामिल हैं। चुनाव के कुछ ही समय के बाद मायावती ने इनमें से ज्यादातर नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक समय में बसपा संस्थापक कांशीराम के निकट सहयोगी और राज्यसभा सदस्य बलिहारी बाबू को भी मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए पार्टी से निष्काषित कर दिया। पलटवार करते हुए बलिहारी बाबू ने मायावती पर धोखे से राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिलवाने का आरोप लगाया और कांग्रेस में शामिल हो गए।

भाजपा के लिए यह साल 'ग्रेट फाल' का रहा

सही मायनों में भाजपा के लिए यह साल 'ग्रेट फाल' का रहा। पिछले साल दिसंबर में राजस्थान और दिल्ली से शुरू हुआ हार का सिलसिला इस साल दिसंबर में झारखंड तक जारी रहा। पार्टी लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव हारी और लालकृष्ण आडवाणी का प्रधानमंत्री बनने का सपना चकनाचूर हो गया। इसके बाद पार्टी की दूसरी पीढ़ी में अपना अपना वर्चस्व कायम करने का ऐसा घमासान मचा जिस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हस्तक्षेप करते हुए 'दिल्ली से बाहर' के व्यक्ति नितिन गडकरी को पार्टी अध्यक्ष बना दिया। आडवाणी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने पर वाजपेई-शेखावत-आडवाणी की मशहूर 'त्रिमूर्ति' में से एक भैरों सिंह शेखावत ने ही उसकी सार्वजनिक मुखालफत करते हुए कहा कि 'प्रधानमंत्री तो जनादेश से तय होगा'। शेखावत ने तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी दो-दो हाथ करते हुए कहा कि जब मैं भाजपा में आया राजनाथ पैदा भी नहीं हुए थे। इसके बाद तो पार्टी में नेताओं के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों और अनुशासनहीनता का 'खुला खेल फर्रूखाबादी' शुरू हो गया। इसी बीच भाजपा में दम घुटने की बात कहते हुए कल्याण सिंह ने पार्टी को एक बार फिर 'टा-टा' कह दिया। भाजपा को एक और बड़ा झटका मार्च में उसके लंबे समय के सहयोगी दल बीजद ने उससे किनारा करके दिया।जसवंत सिंह ने यह कह कर आडवाणी को परेशानी में डाल दिया कि संसद पर हमले के बाद सीमा पर सेना भेजा जाना ठीक निर्णय नहीं था। बाद में उन्होंने आडवाणी के इस दावे की भी हवा निकाल दी कि कंधार विमान अपहरण मामले में कुख्यात आतंकवादियों को छोड़े जाने के कैबिनेट के निर्णय में आडवाणी शामिल नहीं थे। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान ही दिल्ली के विवादास्पद व्यापारी सुधांशु मित्तल को असम का प्रभारी बनाए जाने पर राजनाथ और जेटली के बीच मनमुटाव इस हद तक बढ़ गया कि जेटली ने केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठकों में शामिल होना तक छोड़ दिया। इसी दौरान पीलीभीत से पार्टी के उम्मीदवार वरुण गांधी के कथित मुस्लिम विरोधी भाषण ने पार्टी में दरार को और बढ़ा दिया। बाद में पार्टी के ही कुछ नेताओं ने कहा कि कांग्रेस को जिताने में 'दो गांधी बंधुओं का हाथ रहा, एक राहुल और दूसरे वरुण'। आडवाणी द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निशाना बनाने की रणनीति और पार्टी में आपसी घमासान भाजपा को बहुत भारी पड़ी और वह 2004 के लोकसभा चुनाव में मिली 138 सीटों से घट कर 2009 में 116 सीट पर सिमट गई। इसके बाद पार्टी का अंदरूनी घमासान थमने की बजाए और उग्र हो गया। जून में दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वरिष्ठ नेताओं के बीच हार के कारणों को लेकर आपस में ''तू-तू-मैं-मैं'' तक की नौबत आ गई। बैठक से पहले यशवंत सिन्हा को उनके सभी पदों से हटा दिया गया। लेकिन जसवंत सिंह ने उनका पत्र बैठक में बांटा। शौरी ने भी साथ दिया। बैठक में आडवाणी को भाजपा संसदीय दल का नेता नियुक्त किया गया और उन्होंने अरुण जेटली को राज्यसभा में विपक्ष का नेता तथा सुषमा स्वराज को लोकसभा में पार्टी का उप नेता नियुक्त किया।कार्यकारिणी और आडवाणी के इन फैसलों का यशवंत, जसवंत और शौरी ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि चुनाव में हार के जिम्मेदार लोगों को 'सज़ा की बजाय इनाम' दिया जा रहा है। हार की जिम्मेदारी तय करने के लिए 'छोटी मछलियों' को चुना गया। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को पद से हटने को मजबूर किया गया। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसंधुरा राजे को प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से हटने को कहा गया लेकिन कई महीने नाकों चने चबवाने के बाद ही वह अपनी शर्तो पर हटीं। बाद में शिमला में चिंतन बैठक के दौरान जिन्ना की तारीफ करने को मुद्दा बना कर जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया। इस सबके बीच संघ ने पार्टी में अपना हस्तक्षेप बढ़ाते हुए नेतृत्व परिर्वतन का दबाव बनाया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह दिल्ली के जेटली, सुषमा, वेंकैया या अनंत कुमार की बजाय 60 साल से कम किसी 'बाहरी' व्यक्ति को भाजपा के शीर्ष पद पर चाहता है। संघ के दबाव में पार्टी में नेतृत्व परिर्वतन की प्रक्रिया तेज़ हो गई निर्धारित समय से पहले ही आडवाणी को विपक्ष के नेता पद से हटाने के दूसरे ही दिन नितिन गडकरी को राजनाथ के स्थान पर अध्यक्ष भी घोषित कर दिया गया। गडकरी ने कार्यभार संभालने के बाद पार्टी में 'नया वर्क कल्चर' बनाने की घोषणा की। उनका पहला बड़ा राजनीतिक निर्णय झारखंड में झामुमो के शिबू सोरेन के नेतृत्व में भाजपा के सहयोग से सरकार बनाने का है। उन्हीं शिबू सोरेन के नेतृत्व में जिनको 'दागी' बताते हुए केन्द्रीय मंत्री के रूप में हटाने की मांग को लेकर भाजपा कई दिनों तक संसद की कार्यवाही ठप कर चुकी है।

Monday, December 28, 2009

कानून के दांव पेंच में उलझा रुचिका मामला

रुचिका गिरहोत्रा कांड में यौन शोषण के दोषी हरियाणा के पूर्व डीजीपी एस. पी. एस. राठौर ने आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप हटवा दिया था। इसके अलावा उसने इस मामले की जांच कर रहे एक पूर्व सीबीआई अफसर को रिश्वत देने की भी कोशिश की थी। इस बीच, रुचिका के परिवार ने ऐलान किया है कि इस मामले में राठौर के खिलाफ ताजा केस दायर किया जाएगा, जिसमें उस पर रुचिका को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया जाएगा। उनका यह भी आरोप है कि राठौर ने अपने रुतबे का इस्तेमाल करके रुचिका को उसके स्कूल से निकलवा दिया था। हालांकि रिपोर्ट में छेड़छाड़, आत्महत्या के लिए उकसाने, रिपोर्ट में फर्जी दस्तावेज लगाने के आरोप लगाए थे। लेकिन राज्य में पुलिस का सबसे बड़े अधिकारी के पद पर रहते हुए राठौर ने जांच को प्रभावित करने का पूरा प्रयास किया। केस हल्का क्यों किया गया । हालांकि यही रुचिका मामले का मुख्य बिंदु है जिसे लेकर न्यायालय भी सक के दायरे में आ गई है। लेकिन प्रश्न यह है कि सीबीआई जांच में इतनी देरी क्यों होती है। न्याय के क्षेत्र में यह कहावत प्रचलित है कि देर से न्याय होने से न्याय नहीं मिल पाता है। आईपीसी, सीआरपीसी और पुलिस अधिनियम में बड़े स्तर पर संशोधन करने की जरूरत है। जब तक लोकप्रिय संशोधन नहीं होंगे, आम जनता इसी तरह पिसती रहेगी। शक्तिशाली लोग अपराध करके पाक बने रहेंगे। देश का चारा घोटाला को ही ले लीजिए, एक दशक हो गया है लेकिन अभी तक दोषी कुर्सियों पर बैठे हैं। सत्ता का सुख भोग रहे हैं। पुलिस थाने पर एफआईआर आसानी से दर्ज नहीं होती है। आम जनता को थाने से भगा दिया जाता है। जब एफआईआर ही दर्ज नहीं होगी तो कोर्ट में वाद कैसे चलेगा। और जब एफआईआर दर्ज होती है, तो पुलिस ही तोड़ मरोड़ कर एफआईआर दर्ज करती है। देखा जाए तो नेताओं ने आम जनता को आगे न आने के लिए ही पुलिस का सहारा लेकर उन्हें गलत केसों में फसवा देते है। देश पर शासन करने वाले ही जब घटिया किस्म के नेता होंगे तो ऐसा ही होगा। आम जनता कभी भी एक जुट नहीं हो सकती है। और जिस दिन यह एक हो गए उसी दिन देश की तस्वीर भी बदल जाएगी। यदि रुचिका का परिवार राठौड़ को कड़ी सजा दिलवाना चाहता है तो राठौड़ भी कम कलाकार नहीं है कि वह चुप बैठा होगा, वह भी एक कदम आगे चल रहा होगा। इसके अलावा राठौर की सहायता करने वाले कुछ तत्व भी थे जो यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उसके खिलाफ ऐसे आरोप न लगें। रुचिका के पिता ने कहा कि सीबीआई ने पहले यह आरोप नहीं लगाया इसी लिए राठौर कड़ी सजा से बच गया। अब आईपीसी की धारा 306 के तहत राठौर के खिलाफ केस दर्ज करेंगे। इस मामले में राठौर के वकील अजय जैन ने कहा है कि रुचिका मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की कोशिश कामयाब नहीं होगी क्योंकि ये आरोप तथ्यों के सामने ठहर नहीं पाएंगे।

Sunday, December 27, 2009

ग्रहणों से होगा नए साल का आगाज




31 दिसंबर को रात बारह बजे के बाद जब दुनिया नए साल 2010 के जश्न में डूब ही रही होगी, आंशिक चंद्रग्रहण के दौरान देश में चांद का लगभग आधा हिस्सा थोड़ी देर के लिए धरती के 'आगोश' में समाता दिखाई देगा। सौरमंडल के मुखिया सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की 'त्रिमूर्ति' की अद्भुत लुकाछिपी का नजारा 15 जनवरी 2010 को एक बार फिर निहारा जा सकेगा। इस दिन खंडग्रास सूर्यग्रहण के दौरान चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाएगा।आंशिक चंद्र ग्रहण की शुरूआत 31 दिसंबर को भारतीय समय के मुताबिक रात 12 बजकर 22 मिनट से होगी। चंद्रग्रहण रात एक बजकर 24 मिनट पर खत्म होगा।भारत में आंशिक चंद्रग्रहण रात 12 बजकर 53 मिनट पर अपने चरम स्तर पर होगा। इस दौरान देश में चांद के करीब पचास प्रतिशत भाग को कुछ देर के लिए पृथ्वी की छाया से ढंका देखा जा सकेगा। चंद्रग्रहण तब होता है, जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है। इस स्थिति में चंद्रमा पृथ्वी की ओट में आ जाता है, जिससे उस पर सूर्य की रोशनी नहीं पड़ पाती है। आंशिक चंद्रग्रहण के बाद 15 जनवरी 2010 को खंडग्रास सूर्यग्रहण होगा। इससे नए वर्ष के पहले महीने में दुर्लभ खगोलीय संयोग के 'चार चांद' लग जाएंगे।भारत में खंडग्रास सूर्यग्रहण सुबह 11 बजकर पांच मिनट से दोपहर तीन बजकर 30 मिनट तक दिखाई देगा। खंडग्रास सूर्यग्रहण के चरम स्तर पर सूर्य के 61 प्रतिशत से लेकर 92 प्रतिशत हिस्से को चंद्रमा ढक लेगा।

Monday, December 21, 2009

2009 रिकार्ड महंगाई के रूप में याद किया जाएगा

भारत के कृषि क्षेत्र को 2009 में सूखे के साथ बाढ़ की मार भी झेलनी पड़ी। इसका नतीजा यह हुआ कि सब्जियों के साथ-साथ दालों, चीनी तथा अनाज के दाम आसमान पर पहुंच गए, जिसका खामियाजा उपभोक्तओं को भुगतना पड़ा। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार मई में फिर केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुई, लेकिन कृषि उत्पादों की ऊंची कीमतों पर नियंत्रण रखने में असफल रही। पिछले दो साल के दौरान कृषि क्षेत्र खाद्यान्न उत्पादन के मामले में रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंचा था। लेकिन इस साल खाद्यान्न उत्पादन तो पिछले साल के स्तर पर भी कायम रहने में असफल रहा है। देश का आधा हिस्सा सूखे से प्रभावित रहा। यह 1972 के बाद सूखे की सबसे खराब स्थिति है। हालांकि, 1979, 1987 तथा 2002 के साल भी सूखे के लिहाज से देश के लिए काफी खराब रहे थे। देश के 13 राज्यों के 316 जिलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सालाना आगमन प्रभावित हुआ, जिससे कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ। साथ ही गेहूं निर्यात के फैसले को भी वापस लिया। सरकार ने कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए डीजल सब्सिडी तथा अतिरिक्त बिजली आपूर्ति की घोषणा की, जिससे खड़ी फसलों को बचाया जा सके। क्षोभ की बात यह है कि आजादी के 60 साल से अधिक बाद भी देश की 60 प्रतिशत कृषि बारिश के पानी पर निर्भर है। साथ ही देश में आधुनिक वेयरहाउस या कोल्ड स्टोरेज की काफी कमी है।अभी सरकार सूखे से निपटने के उपाय पूरी तरह कर भी नहीं पाई थी कि देश के चार प्रमुख खाद्य उत्पादक राज्यों :आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र: में देर से हुई बारिश से बाढ़ आ गई। सूखे तथा बाढ़ के दोहरे प्रभाव से खरीफ के खाद्यान्न उत्पादन 2.1 करोड़ टन की कमी आई। इसकी मुख्य वजह चावल उत्पादन में 1.5 करोड़ टन की कमी थी। हालांकि, केंद्र सरकार ने दावा किया कि उसके पास राशन की दुकानों से बिक्री के लिए क्फ् महीने का खाद्यान्न का भंडार है, लेकिन इसके बावजूद खाद्य मुद्रास्फीति साल के अंत तक 19.95 प्रतिशत के दस साल के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई है। प्याज की कीमतों ने भी लोगों की आंखों से आंसू निकाले, वहीं आलू के दाम भी ऊंचाई पर पहुंच गए। 40 रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंची चीनी की मिठास भी फीकी पड़ गई। संप्रग सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून जैसे वादों के बाद सत्ता में लौटी थी। बढ़ती कीमतों के कारण सरकार को कई बार विपक्षी दलों के हमलों का सामना करना पड़ा। यदि सालाना आधार पर देखा जाए, तो आलू के दाम 136 प्रतिशत बढ़े हैं, जबकि दालें 40 फीसद महंगी हुई। प्याज 15.4 प्रतिशत चढ़ा है। अन्य खाद्य वस्तुओं में गेहूं 14 प्रतिशत, दूध 13.6 प्रतिशत, चावल 12.7 प्रतिशत और फल 11 प्रतिशत महंगे हुए।केंद्र ने कई बार कीमतों का दोष राज्य सरकारों पर डालते हुए कहा कि वे कालाबाजारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में असफल रहे हैं। साथ ही सरकार ने तर्क दिया कि पिछले पांच साल के दौरान गेहूं और चावल के न्यूनतम समर्थन मूल्य में काफी बढ़ोतरी हुई है, जिसका खुदरा कीमतों पर असर पड़ा है। इस साल भी धान की सामान्य किस्म का न्यूनतम समर्थन मूल्य 100 रुपए बढ़ाकर 1,000 रुपए प्रति क्विंटल किया गया है। इन सबके बीच सरकार ने चावल और चीनी पर आयात शुल्क खत्म कर दिया। साथ ही चीनी के वायदा कारोबार पर भी रोक लगा दी गई। सरकार ने कीमतों पर नियंत्रण के लिए चावल और चीनी को खुले बाजार में जारी करने का फैसला किया। हालांकि, इन सब नकारात्मक चीजों के बीच खाद्य तेल की कीमतें उचित स्तर पर बनी रहीं। शून्य आयात शुल्क के दौर के बीच 2008-09 के अक्तूबर में समाप्त हुए सीजन में वनस्पति तेलों का आयात 86 लाख टन के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। गेहूं, चावल और चीनी के अलावा सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए आयातित खाद्य तेल तथा दालों की बिक्री भी शुरू की, जिससे खाद्य सब्सिडी में काफी बढ़ोतरी हुई। चालू वित्त वर्ष में खाद्य सब्सिडी के 60,000 करोड़ रुपए के पार जाने की संभावना है। 2004-05 में यह 19,000 करोड़ रुपए रही थी।

Monday, December 7, 2009

रणनीति को अंतिम रूप देने में लगे नुमाइंदे

जलवायु परिवर्तन पर कोपनहेगन में शुरू शिखर सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों के प्रतिनिधि कार्बनडाई आक्साइड और अन्य औद्योगिक गैसों के उत्सर्जन में कटौती के नए समझौते पर कड़ी सौदे बाजी के लिए तैयार हो रहे हैं।भारत सहित दुनिया के प्रमुख देशों द्वारा उत्सर्जन कटौती की जो घोषणा की गई है उसने ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए संधि का लक्ष्य नजदीक दिखने लगा है।इस महत्वाकांक्षी करार तक पहुंचने के लिए राजनीतिक प्रयास तेज हुए हैं, लेकिन विभिन्न देशों को इसके लिए और मेहनत करनी होगी। समय आ गया है। अगले दो सप्ताह के दौरान राष्ट्रों को नतीजा देना होगा। पिछले 17 साल में जलवायु परिवर्तन पर बातचीत में कभी भी ऐसा मौका नहीं आया जब एक साथ इतने ज्यादा देशों ने उत्सर्जन कटौती की प्रतिबद्धता जताई हो।जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय रुख में कोपनहेगन पहले ही 'जलवायु परिवर्तन की समस्या का मुकाबला करने की दिशा में दुनिया के प्रयासों में एक निर्णायक मोड़' बन चुका है। करीब 15,000 प्रतिनिधियों के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा चीन के प्रधानमंत्री वेन ज्याबाओ सहित दुनिया के 100 से ज्यादा नेता 12 दिन तक चलने वाले इस शिखर सम्मेलन में भाग ले रहे हैं।

जोशी ने अब रचा क्रिकेट मैदान में इतिहास

एक वोट से विधानसभा चुनाव हार कर इतिहास रचने वाले केन्द्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री डा सी पी जोशी ने खेल की राजनीति में कदम रखने के साथ ही राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार इंडियन प्रीमियर लीग के अध्यक्ष और बीसीसीआई के उपाध्यक्ष ललित मोदी को संघर्षपूर्ण मुकाबले में छह मतों से पराजित किया। आरसीए के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी सक्रिय राजनेता, केन्द्रीय मंत्री और राजस्थान प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष डा सी पी जोशी ने खेल राजनीति की धुरंधर हस्ती को पटकनी दी है। डा जोशी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिले के दिन ही अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नजर आ रहे थे। मुख्यमंत्री के नजदीकी और आरसीए से लंबे समय से जुडे़ रहे शिव चरण माली के अध्यक्ष पद से अपना नाम वापस लेने के बाद डा जोशी और ललित मोदी के बीच कांटे की टक्कर होने की प्रबल संभावना नजर आने लगी। हालांकि डा. जोशी को निर्विरोध आरसीए अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के लिए रविवार की देर रात तक कोशिशें चलीं लेकिन यह फलीभूत नहीं हो सकी।आईपीएल के जनक ललित मोदी को अपने ही घर में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। राजस्थान क्रिकेट संघ (आरसीए) की सत्ता हासिल करने की मोदी की छह महीने के भीतर दूसरी कोशिश नाकाम रही। भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) के इस कद्दावर प्रशासक को अध्यक्ष पद के चुनाव में सोमवार को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सी. पी. जोशी ने 19-13 से मात दी। चुनाव के दौरान दोनों धड़ों के बीच झड़प भी देखी गई। बीसीसीआई उपाध्यक्ष और इंडियन प्रीमियर लीग के अध्यक्ष मोदी की यह दूसरी हार है। आरसीए अध्यक्ष के रूप में मोदी का कार्यकाल इस साल की शुरुआत में खत्म हो गया था। आरसीए के चुनाव साल भर के भीतर दूसरी बार हुए हैं क्योंकि एक मार्च को हुए चुनाव में मोदी को हराने वाले संजय दीक्षित अपने गुट को एकजुट नहीं रख सके और राज्य सरकार ने एक तदर्थ समिति का गठन किया। उच्चतम न्यायालय ने आज सोमवार को चुनाव कराने के निर्देश दिए थे जिसके लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) एन. एम. कासलीवाल को पर्यवेक्षक बनाया गया था। दीक्षित सचिव के रूप में आरसीए में लौटे हैं जिन्होंने राजेंद्र सिंह राठौड़ को 19-14 से हराया।सवाई मानसिंह स्टेडियम के भीतर जैसे ही चुनाव शुरू हुए माहौल गर्म हो गया और स्थिति समय खराब हो गई जब मोदी और जोशी के समर्थक संघ के कार्यालय के सामने ही एक दूसरे से भिड़ गए। बहुप्रतीक्षित चुनाव के लिए मतदान के बाद जैसे ही वोटों की गिनती शुरू हुई, दोनों गुटों के समर्थकों के बीच झगड़ा शुरू हो गया और बाद में पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। मोदी ने आरोप लगाते हुए कहा कि मेरे कुछ समर्थकों को पीटा गया है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यहां पर गुंडा तत्व है, उन्हे यहां नहीं होना चाहिए। मोदी के करीबी माने जाने वाले कोटा क्रिकेट संघ के सचिव अमिन पठान, जोधपुर क्रिकेट संघ के सचिव अंजनी माथुर और रमेश गुप्ता की पिटाई की गई है। मोदी ने कहा कि यह बड़े दु़ख की बात है कि क्रिकेट में यह सब हो रहा है। लोगों को बिना किसी कारण से धमकाया जा रहा है। राजस्थान क्रिकेट संघ में काफी समय से विवाद चल रहे हैं। एक मार्च को हुए चुनाव में संजय दीक्षित ने ललित मोदी को हरा दिया था, लेकिन संजय अपने ही गुट को एकजुट नहीं रख सके और राज्य सरकार ने क्रिकेट के कामकाज के लिए एक तदर्थ समिति का गठन कर दिया था। झगड़ा उस समय शुरू हो गया जब एक गुट के लोगों ने मोदी के साथ आरसीए परिसर में करीब आधा दर्जन सुरक्षाकर्मियों पर आपत्ति जताई और इसी के बाद दोनों गुटों में बहस शुरू हो गई जो बाद में झगड़े में बदल गई। सी. पी. जोशी ने अपने को इस विवाद से अलग करते हुए कहा कि मैं झगड़े के समय वहां नहीं था। मुझ पर किस तरह से आरोप लगाए जा सकते हैं। मैं तो केवल इतना जानता हूं दूसरे गुट के लोग सुरक्षाकर्मियों के साथ वहां गए। अगर आप वोट डालने जा रहे हैं तो सुरक्षाकर्मियों को साथ ले जाने की क्या जरूरत है।राजस्थान क्रिकेट संघ कार्यकारिणी इस प्रकार है।सीपी जोशी (अध्यक्ष), डा. विमल सोनी (डिप्टी अध्यक्ष), मानवेंद्र सिंह, राजेश कुमार माथुर, राजकुमार माथुर, सुशील शर्मा, विमल शर्मा और विवेक व्यास (सभी उपाध्यक्ष), संजय दीक्षित (सचिव), केके शर्मा, मुहम्मद इकबाल, नावेंदु त्यागी, प्रदीप नागर (सभी संयुक्त सचिव), महेंद्र शर्मा (कोषाध्यक्ष), बालकृष्ण उपाध्याय, फारूक अहमद, करुणेष जोशी और शक्ति सिंह राठौर (सभी आयोजक सचिव), देव राम चौधरी ्र मेघदूत पुष्कर्णा और एन. पाल सिंह (सभी कार्यकारिणी सदस्य)।

Sunday, December 6, 2009

आसाराम बापू के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज


संत आसाराम बापू और दो अन्य के खिलाफ उनके एक पूर्व अनुयायी की हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया गया है। शनिवार देर रात साबरमती के रामनगर इलाके में दो अज्ञात व्यक्तियों ने राजू चांडक पर गोलियां चलाईं। इस मामले में एक एफआईआर दर्ज की गई है। चांडक के बयान के मुताबिक, आसाराम को प्रमुख आरोपी बनाया गया है। उन्हीं के कहने पर दो व्यक्तियों ने चांडक पर मोटरसाइकल से घर लौटते समय गोलियां चलाईं। चांडक वही शख्स है जो आश्रम के खिलाफ डी. के. त्रिवेदी आयोग के सामने पेश हुआ था। यह आयोग आश्रम में पढ़ने वाले दो छात्रों दीपेश और अभिषेक वाघेला की रहस्यमयी मौतों के मामले की जांच कर रहा है। साबरमती नदी के किनारे से लापता होने के दो दिन बाद इन दोनों के शव बरामद किए गए थे। बाद में राज्य सीआईडी ने आश्रम के सात शिष्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन पर गैर इरादतन हत्या और लापरवाही का मामला दर्ज किया था। हालांकि शिष्यों की एफआईआर खारिज करने की याचिका के बाद गुजरात हाई कोर्ट ने केस की जांच पर स्टे लगा दिया था। चांडक को कंधे और छाती में गोलियां लगीं। उसे एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसका ऑपरेशन हुआ। उसकी हालत स्थिर बताई जाती है। पुलिस ने बताया कि तीनों के खिलाफ हत्या के प्रयास और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया गया है। अपराध में पिस्तौल का इस्तेमाल होने की वजह से शस्त्र अधिनियम के तहत भी आरोप लगाए गए हैं। पुलिस के मुताबिक, मामले की जांच की जा रही है पर हमले का कारण अब तक पता नहीं लगा है। आसाराम और उनके अनुयायी पहले भी विवादों में घिर चुके हैं। जुलाई 2008 में अहमदाबाद के उनके आश्रम में दो छात्र रहस्यमय हालात में मृत पाए गए थे। आश्रम पर आरोप लगने के बाद आसाराम के अनुयायियों ने खूब हंगामा किया और स्थानीय लोगों ने उनकी पिटाई कर दी। उनके अनुयायियों पर सूरत में जमीन हड़पने के भी आरोप हैं। पिछले माह उनके करीब 200 अनुयायियों को एक रैली के दौरान पुलिस पर पथराव करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

Thursday, November 26, 2009

26/11 की पहली बरसी, शहीदों को सलाम


मुंबई में पिछले वर्ष 26 नवंबर को हुए आतंकवादी हमलों की पहली बरसी के दिन जनजीवन सामान्य रहा। मुंबई हमले की पहली बरसी पर स्थानीय लोग आतंकवाद के समक्ष नहीं झुकने का स्पष्ट संकेत देते हुए अपनी रोजमर्रा के गतिविधियों में जुटे रहे लेकिन इस दौरान उन्होंने आतंकवादी हमलों में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि भी दी। हजारों लोगों ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (सीएसटी) पर मुंबई हमलों में मारे लोगों को श्रद्धांजलि दी। यहां रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के जवानों ने भी श्रद्धांजलि दी।होटल ट्राइडेंट-ओबरॉय में भी पीडि़तों को श्रद्धांजलि दी गई। लियोपोल्ड कैफे के बाहर भी कई लोग इकट्ठा हुए, जहां पिछले साल आज के ही दिन आतंकवादियों ने हमला किया था।
यह देश 26 नवंबर 2008 को आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले सुरक्षाबलों के अदम्य साहस और मुंबईवासियों के दृढ़ इरादों को सलाम करता है। साथ ही सरकार से अपील है कि वह देश से आतंकवाद के कलंक को पोंछने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए।उल्लेखनीय है कि पिछले साल 26 नवंबर को 10 आतंकवादियों ने मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में हमला बोल दिया था, जिसमें 166 लोग मारे गए थे। सुरक्षा बलों की 60 घंटे की कार्रवाई में नौ आतंकवादी मारे गए थे। सुरक्षा बलों ने मोहम्मद अजमल आमिर कसाब नाम के एक आतंकवादी को जिंदा पकड़ा, जो अभी जेल में है।आतंकवादी हमलों की पहली बरसी के मद्देनजर मुंबई में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। शहर के सभी प्रमुख स्थलों पर वाहनों की जांच की जा रही है।आतंकवादी हमलों में मारे गए लोगों की याद में कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं लेकिन सुबह अन्य दिनों की तरह ही बसों और लोकल ट्रेनों में भीड़ देखी गई।चौपाटी, हाजी अली, प्रभादेवी, वर्ली, बांद्रा, जोगोश्वरी और मुंबई हवाई अड्डे जैसे स्थलों पर विशेष रूप से सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। आतंकवादी हमलों में मारे गए लोगों की याद में कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कुछ निजी और सरकारी कार्यालयों में मृतकों की याद में दो मिनट का मौन भी रखा गया।
उल्लेखनीय है कि पिछले साल 26 नवंबर को 10 आतंकवादियों ने मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में हमला बोल दिया था, जिसमें 166 लोग मारे गए थे। सुरक्षा बलों की 60 घंटे की कार्रवाई में नौ आतंकवादी मारे गए थे। सुरक्षा बलों ने मोहम्मद अजमल आमिर कसाब नाम के एक आतंकवादी को जिंदा पकड़ा, जो अभी जेल में है।मानवता की शक्ति को ऐसे हमलों से कुन्द नहीं किया जा सकता। मुंबई के लोगों ने हमलों के बाद हालात जल्द ही सामान्य कर अपनी आत्मशक्ति जाहिर कर दी।मुंबई आतंकी हमलों में मारे गए लोगों को देश भर में श्रद्धांजलि दी गई। आतंकवाद सभ्य समाज का सबसे बड़ा शत्रु है। आतंकवाद को परास्त करना हर अमन पसंद देश का कर्तव्य है।सभ्य समाज में आतंकवाद को किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता। जो भी देश शंाति और प्रगति चाहता है, उसका कर्तव्य है कि आतंकवाद की बुरी ताकतों का प्रतिरोध करे और उन्हें परास्त करे।आतंकवादियों के वैश्विक नेटवर्क, उनके असीमित संसाधनों और अत्याधुनिक हथियारों के साथ उनके कुत्सित इरादों को ध्यान में रखते हुए सभी देशों द्वारा मानवता के उन शत्रुओं की समाप्ति के लिए समन्वित कार्रवाई करने की तत्काल जरूरत है।आतंकवाद मानवता के लिए सबसे गंभीर खतरा है। उन्होंने कहा कि आतंकवादियों की विवेकहीन हिंसा के चलते कई परिवार तबाह हो गए।मजबूत इच्छाशक्ति, प्रतिबद्ध कार्रवाई के साथ हम आतंकवाद का प्रभावी मुकाबला करने में सक्षम होंगे।मुंबई हमलों में मारे गए भारतीय और विदेशी नागारिकों के सम्मान में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

Monday, November 2, 2009

पृथ्वीराज कपूर: भारतीय सिने जगत के पहले मुगल

भारतीय फिल्मों के आदिकाल से रंगीन सिनेमा तक के सफर का हिस्सा रहे पृथ्वीराज कपूर को भारतीय सिने जगत का पहला मुगल कहा जाए तो गलत न होगा। उनकी रखी नींव पर खड़े फनकारी के साम्राज्य के नुमाइंदों ने सिने प्रेमियों के दिल पर कई दशक तक राज किया। अभिनय के ऊंचे पैमाने तय कर गए पृथ्वीराज के कालजई किरदार आज भी उतने ही जीवंत और अनोखे हैं कि कोई भी उन्हें देखकर उनके मोहपाश में बंधे बगैर नहीं रह पाता। पाकिस्तान के मौजूदा फैसलाबाद में तीन नवम्बर 1906 को पुलिस उपनिरीक्षक दीवान बशेश्वरनाथ कपूर के घर जन्मे पृथ्वीराज कपूर ने फिल्म जगत में अलग मुकाम हासिल करने वाले 'कपूर खानदान' की नींव रखी और उनकी विरासत को अगली कई पीढि़यों ने पूरी शिद्दत के साथ जिया। पृथ्वीराज अपने जमाने के सबसे पढ़े-लिखे अभिनेताओं में से थे। उन्होंने पेशावर के एडवर्ड्स कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की और फिर वकालत की पढ़ाई की। हालांकि उनका दिल रंगमंच के लिए ही धड़कता था। उसी दौरान वह प्रोफेसर जय दयाल के सम्पर्क में आए जिन्होंने पृथ्वीराज में अपने नाटकों के अनेक पात्रों को बखूबी निभाने की क्षमता देखी। वर्ष 1928 में पृथ्वीराज मायानगरी बम्बई चले आए। उस वक्त मूक फिल्मों का दौर था और उन्होंने ऐसी करीब नौ फिल्मों में काम भी किया। वर्ष 1931 में बनी देश की पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' में किरदार अदा करके उन्होंने भारतीय सिनेमा जगत में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवा लिया।पृथ्वीराज की कद-काठी, किरदार में डूबे हाव-भाव और संवाद अदायगी देखने वालों के दिलोदिमाग पर जल्द ही छा गई। वर्ष 1941 में आई सोहराब मोदी की फिल्म सिकंदर के मुख्य किरदार में उन्हें खूब सराहा गया। सफलता की सीढि़यां चढ़ने के दौरान उन्होंने साल 1944 में अपना थिएटर ग्रुप खोला और पृथ्वी थिएटर की स्थापना की। यह पहला आधुनिक, पेशेवर और शहरीकृत हिन्दुस्तानी थिएटर था। इस थिएटर ने अपने 16 वर्ष के जीवनकाल में ढाई हजार से ज्यादा शो पेश किए जिनमें से ज्यादातर में पृथ्वीराज ने ही प्रमुख भूमिका अदा की। पृथ्वीराज कपूर ने करीब 70 बोलती फिल्मों में काम किया जिनमें विद्यापति :1937:, पागल :1940:, सिकंदर :1941:, आवारा :1951: और आनन्द मठ :1952: में उनकी शीर्ष और सहायक भूमिकाओं को खूब तारीफ मिली। 1960 में आई फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में उन्होंने मुगल सम्राट अकबर के किरदार को जीकर अमर बना दिया। उस फिल्म में उन्होंने हिन्दुस्तान के सम्राट के रूप में अपने कर्तव्य और पिता के सीने में भड़कते जज्बात के द्वंद्व को बेहद पुरअसर ढंग से जिया। मुगल-ए-आजम से पहले और उसके बाद भी अकबर के किरदार वाली कई फिल्में बनीं लेकिन अभिनय के लिहाज से कोई दूसरा अभिनेता मुगल-ए-आजम में दिखे जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर की बराबरी नहीं कर सका। श्वेत-श्याम फिल्म मुगल-ए-आजम का मशहूर गाना 'प्यार किया तो डरना क्या', रंगीन फिल्माया गया था।हिन्दी रंगमंच और फिल्मों की महान हस्ती का दर्जा हासिल कर चुके पृथ्वीराज कपूर का 29 मई 1972 को निधन हो गया। पृथ्वीराज ने अभिनय के अलावा अपनी विरासत से भी हिन्दी सिनेमा जगत को काफी कुछ दिया। वह 'हिन्दी फिल्म कलाकारों के पहले परिवार' यानी 'कपूर खानदान' के मुखिया हैं और अपनी अगली चार पीढि़यों के रूप में उनकी विरासत आज भी हिन्दी फिल्म जगत में जिंदा है। पृथ्वीराज के बेटे राजकपूर ने हिन्दी फिल्मों के पहले 'शोमैन' का रुतबा हासिल किया था। राजकपूर ने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अनेक बेहतरीन फिल्मों में काम किया और कई यादगार फिल्में बनाईं। कई फिल्मों में उन्होंने अपने पिता की मदद भी ली। पृथ्वीराज की अन्य संतानों शशि कपूर और शम्मी कपूर ने भी फिल्मों में अपना अलग मुकाम बनाया। पृथ्वीराज के पौत्र रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, राजीव कपूर, करण कपूर और कुणाल कपूर ने भी फिल्मों में काम किया। इनमें से विशेषकर ऋषि कपूर को बतौर अभिनेता खासी सफलता हासिल हुई। रणधीर की बेटी करिश्मा के रूप में कपूर खानदान की पहली लड़की ने अभिनय जगत में कदम रखा। उसके बाद करिश्मा की बहन करीना भी फिल्मों में आ गईं और इस वक्त की शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार हैं। ऋषि कपूर के बेटे रणबीर कपूर ने वर्ष 2007 में आई फिल्म 'सांवरिया' से अभिनय क्षेत्र में आमद दर्ज कराई। इस तरह पृथ्वीराज द्वारा शुरू की गई अभिनय की समृद्ध परम्परा अब भी बरकरार और फलफूल रही है।

Monday, October 12, 2009

क्या कांग्रेस परंपरा को तोड़ पाने में कामयाब होगी

हरियाणा में कल चुनाव होना है और सत्तारूढ़ कांग्रेस सत्ता बरकरार रखने के लिए सभी प्रयास कर रही है, साथ ही वह तीन दशक पुरानी उस परंपरा को तोड़ने की कोशिश में है जिसके अनुसार कोई भी सत्तारूढ़ सरकार सत्ता में वापस आने में सफल नहीं रही है। सभी 90 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस ने राज्य में पहले तीनों विधानसभा चुनाव 1967, 1968 और 1972 में जीत हासिल की थी। पार्टी ने इस बार अपनी सत्ता को बरकरार रखने का लक्ष्य तय किया है जबकि 1977 के बाद कोई भी पार्टी दोबारा सत्ता में नहीं आई। भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार ने सात महीने पहले ही विधानसभा चुनाव कराने का फैसला किया ताकि मई में लोकसभा चुनाव की लोकप्रियता को भुनाया जा सके। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को दस में से नौ सीटें मिली थीं। वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 67 सीटें जीतकर सत्तारूढ़ हुई थी जबकि इस वर्ष संसदीय चुनावों में पार्टी को 59 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल हुई। विपक्षी पार्टियों भाजपा और आईएनएलडी के बीच अलगाव और हरियाणा जनहित कांग्रेस एवं बसपा के अकेले चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस खेमे को सभी सीटों पर बहुकोणीय मुकाबले के बीच जीत की उम्मीद है। चुनाव में ओमप्रकाश चौटाला के नेतृत्व वाले आईएनएलडी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है जिसे 2005 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ नौ सीटें मिली थीं और लोकसभा चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुला।पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके चौटाला सिरसा के इलेनाबाद और जींद के उचाना कलां से विधान सभा चुनाव लड़ रहे हैं। भंग विधानसभा में सिर्फ एक विधायक वाली भाजपा अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश में है और राज्य में अगली सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद में है। पिछले विधानसभा चुनाव में सिर्फ एक विधायक वाली बसपा कुछ इलाकों में कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में है। लेकिन इतना तय है कि विपक्ष के बिखराव का लाभ कांग्रेस को अवश्य मिलेगा। वर्तमान सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से भी अलग रही, जैसा कि चौटाला सरकार पर लगे थे। विकास के क्षेत्र में काम भी हुए हैं जिसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। अब मतदाताओं की सोच में भी बदलाव आ गया है। मतदाता सिर्फ विकास को ही मोहरा बनाकर चलते हैं। जैसा कि लोक सभा चुनाव में देखने को मिला था। धनबलों और बाहुबलों को चारों खाने चित कर दिए थे। इसलिए हो सकता है कि कांग्रेस तीस वर्ष पुरानी परंपरा को तोड़ने में कामयाब हो जाए और सत्तारूढ़ बनी रहे।

Friday, October 9, 2009

ओबामा को नोबेल पुरस्कार चौंका देने वाला


वर्ष 2009 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुने गए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को यह प्रतिष्ठित सम्मान हासिल करने में टकराव दूर करने और ईरान तथा उत्तर कोरिया जैसी 'बुराई की धुरी' के साथ कूटनीति अपनाने की उनकी रणनीति, मुस्लिम जगत की ओर उनके हाथ बढ़ाने तथा परमाणु शस्त्रों से मुक्त विश्व के उनके उद्देश्य के जरिए मदद मिली होगी। इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए ओबामा के चुने जाने की खबर अमेरिकियों के साथ ही शेष विश्व के लोगों के लिए भी चौंका देने वाली रही क्योंकि उनका नाम न तो संभावितों की सूची में कहीं था और न ही नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदारों में उनके बारे में कोई अटकल थी। ओबामा ने बतौर राष्ट्राध्यक्ष एक वर्ष से कम समय बिताया है। माना जा रहा है कि विश्व का यह सबसे प्रतिष्ठित शांति पुरस्कार उन्हें काफी जल्द मिला है। गत 20 जनवरी को पदभार ग्रहण करने के बाद ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए थे। उन्होंने अमेरिका के दो युद्ध लड़ने के तरीकों की आलोचना और मुस्लिम जगत में उसकी जवाबी प्रतिक्रिया के बाद देश का रुतबा बहाल करने के लिए निरंतर कोशिशें की हैं।ओबामा के पूर्ववर्ती अधिकारी जार्ज डब्ल्यू बुश ने ईरान, इराक और उत्तर कोरिया को 'बुराई की धुरी' करार दिया था और उन पर आतंकवाद की मदद करने और जनसंहार के हथियार की तलाश में रहने का आरोप लगाया था। मध्य पूर्व के लिए विशेष दूत की नियुक्ति के बाद ओबामा इस्राइल और फिलस्तीनी नेताओं को एक मंच पर लेकर आए ताकि क्षेत्र में टिकाउू शांति लाई जा सके। कीनियाई मूल के पिता और श्वेत मां के पुत्र 44 वर्षीय ओबामा ने ईरान और यहां तक कि म्यांमार जैसे देशों के साथ भी बातचीत के दरवाजे खोले जिन पर बीते कई वर्षो से आर्थिक प्रतिबंध लागू हैं। उनकी वैश्विक कूटनीति का मुख्य केंद्र मुस्लिम जगत की ओर हाथ बढ़ाना रहा जो अफगानिस्तान और इराक में युद्ध के चलते लंबे समय से अमेरिका को अपना दुश्मन मानता है। उन्होंने गत जून काहिरा यात्रा की जहां उन्होंने मुस्लिम जगत के साथ संबंधों पर प्रमुख भाषण किया। हालिया संपन्न संयुक्त राष्ट्र महासभा में ओबामा ने विश्व से परमाणु शस्त्रों की कटौती के लिए भी पहल की। यह कहना जल्दबाजी होगी कि ओबामा अपनी कोशिशों में कितने सफल हुए हैं लेकिन नोबेल समिति ने कहा कि वह चाहती है कि ओबामा अपनी कूटनीतिक कोशिशों को विस्तार दें।

Thursday, October 8, 2009

हुड्डा का फैसला दांव पर

हरियाणा विधानसभा चुनाव के मतदान की तारीखें नजदीक आने के साथ ही मुख्यमंत्री भूपेंद सिंह हुड्डा के माथे पर चिंता की लकीरें पड़ने लगी हैं। समयपूर्व चुनाव करवाने का हुड्डा का फैसला दांव पर लगा है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 90 में से 67 सीटें जीती थीं। हालांकि कांग्रेस इस बार भी सबसे आगे है और उसे बहुमत मिलने की संभावनाएं बताई जा रही हैं। मगर हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में 10 में से 9 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के लिए पिछले विधानसभा की सफलता दोहराना मुश्किल लग रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद हुड्डा ने कांग्रेस हाईकमान को राज्य में छह माह पूर्व विधानसभा चुनाव करवाने पर राजी कर लिया था। लेकिन कांग्रेस के बागी उम्मीदवारों, महंगाई और इंडियन नैशनल लोकदल के चीफ ओमप्रकाश चौटाला के परिवार से लोगों की नाराजगी कम होने से कांग्रेस की संभावनाओं पर विपरीत असर दिखने लगा है। गोहाना मुख्यमंत्री हुड्डा का घर है। बुधवार को यहां हुड्डा ने एक बड़ी सभा की। हुड्डा ने खासतौर से कांग्रेस के बागी उम्मीदवारों से जनता को होशियार किया। सोनीपत , रोहतक और झज्जर के इस जाट बहुल इलाके के नतीजे ही तय करेंगे कि हुड्डा पिछले साढ़े चार साल में जाट लैंड में कितने बड़े जाट नेता बन पाए हैं। एआईसीसी (ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी) ने गोहाना में प्रमुख जाट नेता डॉ. नरेश कुमार को ऑब्जर्वर बना कर भेज रखा है। कांग्रेस के बागी उम्मीदवार किताब सिंह मलिक इस इलाके में कांग्रेस के लिए मुसीबत बने हुए हैं। हालांकि नरेश कुमार मलिक को ज्यादा अहमियत देने से बचने की कोशिश करते हैं, मगर उनका लगातार वहीं डेरा डालने रखना बताता है कि कांग्रेस को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा है। हरियाणा में तीनों लालों, बंसी लाल, देवी लाल और भजन लाल की राजनीति खत्म होने के बाद हुड्डा को वहां साढ़े चार साल काम करने का मौका मिला। पिछले विधानसभा चुनाव के बारे में हरियाणा में कहा जाता है कि लोगों ने कांग्रेस को जिताने के लिए नहीं बल्कि चौटाला को हराने के लिए वोट किया था। इस बार हुड्डा को अपने काम पर लोगों की मुहर लगवानी है। नरेश कुमार ने सभा में हुड्डा के काम को एक नया एंगल देते हुए कहा कि पिछले दिनों दिल्ली का विकास यूपी की दिशा में हो रहा था मगर हुड्डा ने वापस दिल्ली का मुंह हरियाणा की तरफ मोड़ दिया। विकास की धारा को कुंडली ( सोनीपत) की और खींच कर लाने के काम को जारी रखने के लिए उन्होंने कांग्रेस को वापस लाने की अपील की। विधानसभा का यह चुनाव चौटाला के लिए राजनीतिक जीवन-मरण का सवाल है। साथ ही जाट नेता कौन का भी यक्ष प्रश्न है? चौटाला के लगातार कमजोर होने के बाद से हुड्डा खुद को जाटों का सबसे बड़ा नेता मानने लगे हैं। सर छोटू राम के बाद देवीलाल इस इलाके में बड़े कद के नेता रहे। यह चुनाव हुड्डा और चौटाला में से किसी एक का कद बढ़ाने जा रहा है।

Monday, October 5, 2009

कोर्ट के साथ पॉलिटिक्स मत करो


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश की मायावती को करारी झाड़ लगाई। सुप्रीम कोर्ट के आ
देश के बावजूद मूर्तियों के निर्माण का काम न रोके जाने के मामले पर अदालत ने नाराजगी जाहिर की। जस्टिस बी. एन. अग्रवाल और जस्टिस आफताब आलम की बेंच ने यूपी सरकार को लताड़ते हुए कहा कि हमारे साथ इस तरह व्यवहार मत कीजिए जैसे आप असेंबली में करते हैं। कोर्ट अपना राजनीतिक विरोधी मत समझिए। यहां आपको कोई पॉइंट नहीं बनाने हैं। बेंच ने सरकारी प्रतिनिधि सतीश चंद्र मिश्रा और हरीश साल्वे से कहा कि सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है, जैसे तर्कहीन भीड़ करती है, जिसे कानून की कोई परवाह नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि भीड़तंत्र और लोकतंत्र में यही फर्क होता है कि लोकतंत्र संविधान के आधार पर काम करता है। उन्होंने कहा कि आदेश के बावजूद निर्माण का काम जारी रखकर सरकार ने कोई समझदारी का परिचय नहीं दिया है। अब कोर्ट को भी समझ में आ गया कि मायावती की कथनी और करनी में बहुत अंतर है। आखिर ऐसी क्या बात है कि 2600 करोड़ रुपए के भारी भरकम बजट को मूर्तियों के निर्माण पर खर्च कर रही हैं, वो भी तब जब प्रदेश सूखे की चपेट में है। किसान दर-दर की ठोकरें खाते फिर रहें हैं। एक मायने में देखा जाए तो कांशीराम इतने बढ़े राष्ट्रीय नेता भी नहीं थे कि उनके लिए इतना भारी भरकम बजट को उनकी मूर्तियां बनाकर खर्च कर दिया जाए। प्रदेश के विकास की गाड़ी होले-होले भी नहीं बढ़ रही है। किसान आंदोलन कर रहे हैं कि उनकी जमींने प्राधिकरण जबरन छीन रही हैं, उद्योग लगाने के नाम पर, वह निजी बिल्डर्स को बेंच रहीं हैं। नोएडा में तो किसानों पर नंगा नाच हो रहा है। किसानों की कृषि योग्य भूमि को सरकार जबरन हथिया रही है। किसानों के पास जब जमीन ही नही रहेगी तो वह किसान फिर क्या करेंगे। किसान अपनी जमीन को किसी और को बेंचते है और उस पर बाकादा रजिस्टर्ड मकान बनते हैं तो कहा जाता है कि वह अवैध कालोनी है, इसी से सरकार से नाराज होकर अब किसान एक जुट होकर सड़क पर आकर सरकार के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया है। जब मायावती सरकार देश की सबसे बड़ी कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट को धोखा दे सकती है तो फिर किसान किस खेत की मूली है।

Thursday, September 24, 2009

चंद्रयान ने खोजा चांद पर पानी

भारत के पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 ने चांद की सतह पर पानी की मौजूदगी के प्रमाण खोज निकाले हैं। चंद्रयान-1 के साथ भेजे गए नासा के उपकरण 'मून मिनरलोजी मैपर' ने परावर्तित प्रकाश की तरंगदै‌र्ध्य का पता लगाया जो ऊपरी मिट्टी की पतली परत पर मौजूद सामग्री में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक संबंध का संकेत देता है। चंद्रयान-1 द्वारा जुटाए गए विवरण का विश्लेषण ने चंद्रमा पर पानी के अस्तित्व की पुष्टि कर दी है। इस खोज ने चार दशक से चले आ रहे इन कयासों पर विराम लगा दिया है कि चंद्रमा पर पानी है या नहीं। यह दावा उन्होंने अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा स्मृति के रूप में धरती पर लाए गए चंद्र चट्टानों के नमूनों के अध्ययन के बाद किया था, लेकिन उन्हें अपनी इस खोज पर संदेह भी था क्योंकि जिन बक्सों में चंद्र चट्टानों के अंश लाए गए, उनमें रिसाव हो गया था। इस कारण यह नमूने वातावरण की वायु के संपर्क में आकर प्रदूषित हो गए थे।वैज्ञानिकों का मानना है कि नाभिकीय विखंडन के परिणामस्वरूप चंद्रमा पर चट्टानों और मिट्टी में मौजूद ऑक्सीजन की प्रोटोन्स के रूप में सूर्य द्वारा उत्सर्जित हाइड्रोजन के साथ हुई अंत:क्रिया से पानी बना होगा। जैसे ही ए प्रोटोन चंद्रमा से टकराते हैं, वे ऑक्सीजन को मृदा तत्वों से अलग कर देते हैं। जहां स्वतंत्र ऑक्सीजन और हाइड्रोजन एक साथ होते हैं, वहां इस बात का पता लगाने के अधिक अवसर होते हैं कि वहां पानी बनेगा।उपकरण ने पानी के तत्वों की पहचान के लिए इस बात का विश्लेषण किया कि चंद्रमा की सतह पर सूर्य का प्रकाश किस तरह परावर्तित होता है जिसमें वैज्ञानिकों ने पानी जैसे रासायनिक संबंधों वाले तत्वों को पाया।वैज्ञानिकों ने विभिन्न खनिजों की विभिन्न तरंदैध्र्यो में परावर्तित प्रकाश का अध्ययन किया और इन अंतरों का इस्तेमाल यह जानने के लिए किया कि ऊपरी मिट्टी की पतली परत में क्या मौजूद है। टीम का मानना है कि उनकी खोज का खास महत्व है, क्योंकि चंद्रमा पर जाने की मानव की इच्छा लगातार बनी हुई है। भारत के पहले मून मिशन चंद्रयान ने चांद पर पानी ढूंढ़ लिया है। चंद्रयान अपने साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का मून मैपर लेकर गया था। मून मैपर को चांद की सतह पर पानी के सबूत मिले हैं। चांद की सतह पर पानी झील या तलाब के रूप में नहीं है बल्कि चट्टान और धूलकणों में भाप के रूप में फंसा हुआ है। जाहिर है पानी की मात्रा काफी कम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि चांद धरती के किसी भी मरुस्थल से ज्यादा शुष्क है लेकिन इसकी मिट्टी में मौजूद नमी से पानी निकाला जा सकता है। इससे पहले चांद के पास उन गड्ढों में बर्फ पाई गई थी, जहां सूर्य की किरणें नहीं पहुंचती हैं। चंद्रयान के जरिए चांद पर पानी के सुराग मिलने को भारत के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है। चंद्रयान ने इसरो से संपर्क टूटने से पहले ही चांद पर पानी की तस्वीरें भेजी थीं। चांद पर पानी के बाद अब वहां जिंदगी होने की संभावना बढ़ गई है। इसरो प्रमुख ने कहा कि चंद्रयान इसरो के लिए 100 फीसदी सफल रहा है। इसरो चंद्रयान द्वारा भेजे गए आंकड़ों का अध्ययन कर रहा है। अब हम चंद्रयान 2 मिशन के उपर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

Sunday, September 20, 2009

चैम्पियन्स ट्राफी में भारत के आड़े आ सकती है अनुभव की कमी


दक्षिण अफ्रीका में 2007 ट्वेंटी20 विश्व कप जीतने के बाद इसी देश में एक बार फिर चैम्पियन्स ट्राफी एकदिवसीय टूर्नामेंट जीतने की सपना देखने वाली महेंद्र सिंह धोनी की टीम को सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और हरभजन सिंह की अनुभवी तिकड़ी से काफी उम्मीद होगी क्योंकि उसके कई खिलाडि़यों को इस अफ्रीकी देश में एकदिवसीय और टेस्ट मैच खेलने का अनुभव नहीं है। भारत को इसके अलावा चोटिल तेज गेंदबाज जहीर खान की कमी खल सकती है जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका की तेज गेंदबाजी की अनुकूल पिचों पर अपनी आग उगलती गेंदों के दम पर 17 मैचों में 20.35 की बेहतरीन औसत के साथ 31 विकेट चटकाए हैं। तेंदुलकर, द्रविड़ और हरभजन ने हाल में श्रीलंका में भारत को काम्पैक कप त्रिकोणीय एकदिवसीय टूर्नामेंट जिताने में अहम भूमिका निभाई थी और टीम को उम्मीद होगी कि यह अपार अनुभवी जोड़ी एक बार फिर सभी आशाओं पर खरी उतरेगी। काम्पैक कप के तीन मैचों में एक शतक की मदद से 70.33 की औसत से सर्वाधिक 211 रन बनाने वाले मास्टर ब्लास्टर तेंदुलकर ने दक्षिण अफ्रीकी सरजमीं पर भारतीय टीम की ओर से सर्वाधिक 36 मैच खेले हैं और 40.40 की औसत से चार शतक और छह अर्धशतक की मदद से 1414 रन बनाए हैं।चोटिल सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग की गैरमौजूदगी में भारत को अच्छी शुरूआत दिलाने का दारोमदार एक बार फिर उन्हीं के कंधे पर होगा। सहवाग दक्षिण अफ्रीका में संपन्न इंडियन प्रीमियर लीग टू के दौरान दिल्ली डेयरडेविल्स की ओर से खेलते हुए चोटिल हो गए थे और इंग्लैंड में टी20 विश्व कप तथा श्रीलंका में त्रिकोणीय श्रृंखला में नहीं खेल पाए थे। तेंदुलकर के अलावा द्रविड़ ने दक्षिण अफ्रीका की सरजमीं पर 27 मैच में 44.73 की बेहतरीन औसत से 850 रन बनाए हैं जबकि हरभजन ने 18 मैचों में 33.57 की औसत से 19 विकेट चटकाए हैं। भारतीय शीर्ष क्रम के अन्य बल्लेबाजों में युवराज सिंह दक्षिण अफ्रीका में रनों के जूझते रहे हैं और 17 मैचों में 18 रन प्रति पारी की मामूली औसत से मात्र 308 रन बना पाए हैं जबकि कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, सुरेश रैना को भी यहां अधिक खेलने का अनुभव नहीं है। धोनी ने दक्षिण अफ्रीका में जहां चार एकदिवसीय मैचा खेले हैं वहीं रैना ने सिर्फ एक मैच खेला जिसमें उन्होंने चार रन बनाए। दूसरी तरफ सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर, आक्रामक बल्लेबाज यूसुफ पठान, तेज गेंदबाज ईशांत शर्मा और आरपी सिंह ने दक्षिण अफ्रीकी धरती पर कभी कोई एकदिवसीय या टेस्ट मैच नहीं खेला है जो भारत के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

बढ़ता वंशवाद

विधानसभा चुनाव का सामना कर रहा महाराष्ट्र में वंशवाद कोई अपशब्द नहीं है। यहां राष्ट्रपति के पु़त्र सहित कई नेताओं के रिश्तेदार 13 अक्तूबर को होने वाले मतदान के लिए टिकट पाने की आकांक्षा रखते हैं। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पुत्र राजेंद्र उर्फ राव साहेब शेखावत अमरावती से कांग्रेस का टिकट चाह रहे हैं। इस सीट से अभी कांग्रेस के ही राज्य मंत्री सुनील देशमुख विधायक हैं। वह दोबारा टिकट पाने के लिए संघर्षरत हैं। महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री और राकांपा नेता छगन भुजबल के पुत्र पंकज भुजबल नासिक स्थित नंदगांव से पार्टी का नामांकन चाह रहे हैं। भुजबल के रिश्तेदार समीर नासिक से राकांपा सांसद हैं, जबकि उप मुख्यमंत्री खुद जिले की एओला सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। दिवंगत भाजपा नेता प्रमोद महाजन की पुत्री पूनम महाजन मुंबई की घाटकोपर पश्चिम सीट से भाजपा प्रत्याशी हैं।शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन उन्हें पार्टी का एक धड़ा शिवसेना-भाजपा गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देखता है। उद्धव शिवेसना सुप्रीमो बाल ठाकरे के पुत्र हैं। उनके भतीजे राज ठाकरे ने तब अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली थी जब बाल ठाकरे ने नेतृत्व संभालने के लिए अपने पुत्र को तरजीह दी। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे की अपने भतीजे धनंजय को मराठवाड़ा क्षेत्र के बीड़ जिले की रेनापुर सीट से चुनावी मैदान में उतारने की योजना है। कांग्रेस की चुनाव प्रबंध समिति के अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री विलाराव देशमुख अपने पुत्र अमित को लातूर शहर से पार्टी उम्मीदवार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। देशमुख ने कई साल इस सीट का प्रतिनिधित्व किया था। इसमें वह दौर शामिल था जब वह आठ वर्ष महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे अपनी पुत्री प्रणेती को सोलापुर की अपनी मजबूत पकड़ वाली सीट से टिकट दिलाना चाहते हैं।कांगे्रेस मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है। वह भी दिवंगत नेता एस बी. चव्हाण के पुत्र हैं जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। राकांपा प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजीत पवार कई सालों तक बारामती में अपने चाचा के गढ़ का प्रतिनिधित्व करने के बाद मजबूत नेता के रूप में उभरे हैं। राकांपा प्रमुख की पुत्री सुप्रिया सुले बारामती लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करती हैं। राज्य में हाल ही में गठित तीसरे मोर्चे के नेताओं में से एक राजेंद्र गवई केरल के राज्यपाल आरएस गवई के पुत्र हैं और आरपीआई के एक धड़े के अध्यक्ष रह चुके हैं। महाराष्ट्र में मंत्री नारायण राणे और विजय सिंह मोहिते पाटिल के पुत्र संसद सदस्य बन चुके हैं। राणे के पुत्र नीलेश लोकसभा सांसद और मोहिते पाटिल के पुत्र रणजीत राज्यसभा सांसद हैं। केंद्रीय मंत्री प्रतीक पाटिल दिवंगत मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल के पौत्र और दिवंगत कांग्रेस नेता प्रकाश पाटिल के पुत्र हैं।

Thursday, September 17, 2009

किसान निर्भर हैं मानसून पर


देश को आजाद हुए 62 साल हो चुके हैं। इस दौरान उसने सूचना, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक उत्पादन जैसे कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलता हासिल की। लेकिन पानी के प्रबंधन के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए। यही कारण है कि हमारे किसान आज भी मानसून पर निर्भर हैं। भारत इस समस्या का हल नहीं खोज सका। पानी नहीं बरसता तो हाहाकार मच जाता है, और बरसे तो भी। यह जल के कुप्रबंधन का ही नतीजा है कि हर दो तीन वर्षो में मानसून सरकार के छक्के छुड़ा देता है। लेकिन किसी सरकार ने इससे सबक लेने की जरूरत नहीं समझी। देश में करीब चार करोड़ 50 लाख किसान ऐसे हैं जो मानसून पर निर्भर हैं। इस साल जून-सितंबर के मानसून सीजन में इतनी कम बारिश हुई, जितनी पिछले कई दशक से नहीं हुई। देश के करीब 604 जिले यानी करीब आधा भारत सूखे से प्रभावित है। देश के सबसे गरीब प्रदेशों में एक बिहार ने 38 जिलों में 26 में सूखा को घोषित किया है। एक करोड़ 80 लाख की आबादी वाले उत्तर प्रदेश ने धान की फसल के अनुमान में 60 फीसदी कटौती की है। रबी की फसल के भी खराब रहने के अनुमान है। इसका कारण ये है कि ज्यादातर पानी के स्रोतों में कम पानी है। मानूसन सत्र के अंत में हुई बारिश से कुछ राहत जरूर मिलेगी। लेकिन इससे किसानों कोई विशेष फायदा नहीं होगा। किसानों के आत्महत्या करने की खबरें फिर आने लगी हैं। पिछले महीने आंध्र प्रदेश में 20 किसानों ने आत्महत्या कर ली। यह संख्या बढ़ भी सकती है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 18 फीसदी है। 1990 में यह 30 फीसदी था। इतना महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के बावजूद देश का दुर्भाग्य देखिए कि यह महज 15 दिन की बढि़या बारिश पर निर्भर करता है। लेकिन देश में कम बारिश होना जितनी बड़ी समस्या है उससे कहीं अधिक बड़ी समस्या है ज्यादा बारिश हो जाना। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल जुलाई तक देश के विभिन्न इलाकों में आई बाढ़ में करीब 992 लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों बेघर हुए हैं। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि बर्बाद हुई है। बाढ़ का प्रभाव सबसे ज्यादा बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम और उत्तर प्रदेश पर पड़ा है। पश्चिम बंगाल में इस महीने की शुरुआत से अब तक 21 हजार लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। यहां के पांच हजार 103 गांव और 10 हजार एकड़ कृषि भूमि इससे बर्बाद हो गई। बिहार में बाढ़ ने तीन लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित किया है। विडंबना देखिए कि गया और नालंदा जैसे क्षेत्र जो जून जुलाई तक गंभीर सूखा महसूस कर रहे थे, वहां बाढ़ ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया। देश की आबादी 2050 तक करीब 17 अरब पहुंचने के आसार हैं। पानी के कुप्रबंधन की समस्या से अगर भारत जल्द न निपटा तो भविष्य में स्थितियां विकराल हो सकती हैं। पानी के प्रबंधन में भारत की जनसंख्या और गरीबी बड़ी चुनौतियां हैं। पानी को लेकर विभिन्न राज्य सरकारों के बीच विवाद इस समस्या को और गहरा सकती है। सरकार को निश्चित ही इस दिशा में गंभीरता पूर्वक कदम उठाने होंगे।

Monday, September 14, 2009

बीजेपी ने दिया जोर का झटका

तीन राज्यों के विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी अपनी सीटें बचाने में तो सफल रही ही गुजरात और मध्य प्रदेश में कांग्रेस से सीटें छीनकर उसे झटका भी दे दिया। उत्तराखंड में विकासनगर सीट फिर से हासिल करने से विधानसभा में बीजेपी को वहां अकेले ही बहुमत मिल गया है। 70 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के अब 36 विधायक हो गए हैं। गुजरात में 7 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव से एक बार फिर यह बात साबित हो गई है कि नरेद्र मोदी का जादू बरकरार है। यहां सत्ताधारी बीजेपी की झोली में 5 सीट गए हैं और कांग्रेस को मात्र दो जगह-धोराजी व कोडिनार में सफलता मिली है। लोकसभा और जूनागढ़ नगरपालिका चुनाव में बीजेपी को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर बीजेपी ने उपचुनाव के लिए हाई प्रोफाइल प्रचार अभियान नहीं चलाया था। इसके बावजूद तीन सीटें -देहगाम, जसदान और चोटिला कांग्रेस से छीन ली है। सामी विधानसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी भावसिंह राठौड़ ने जीत दर्ज की है। वह विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर इसी सीट से चुनाव जीते थे, पर लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हो गए थे। उत्तरी गुजरात की देहगाम, दांता, सामी और सौराष्ट्र की कोडिनार, धोराजी, जसदान व चोटिला विधानसभा सीटों पर 10 सितंबर को उपचुनाव कराए गए हैं। इन सात सीटों में से कांग्रेस के पास छह सीटें थीं, जबकि कोडिनार सीट बीजेपी के पास थी। कांग्रेस ने बीजेपी का गढ़ मानी जने वाली सौराष्ट्र की कोडिनार विधानसभा सीट उससे छीन ली है और धोराजी सीट पर पार्टी ने अपना कब्जा बरकरार रखा है। धोराजी में कांग्रेस प्रत्याशी जयेश रदादिया ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी जयसुख थेसिया को 15,988 मतों के अंतर से हराया। जसदान सीट बीजेपी ने कांग्रेस के हाथों से छीन ली है। इस सीट पर बीजेपी के भरत भोगरा ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की भावना बावलिया को 14,774 मतों के अंतर से हराया। कांग्रेस को अपने गढ़ जसदान में जोर का झटका लगा है। आजादी के बाद इस सीट से कभी न हारने वाली कांग्रेस के हाथों से इस बार यह सीट निकल गई। इस सीट पर बीजेपी के प्रत्याशी की विजय हुई है। सामी में बीजेपी के भाव सिंह राठौड़ को जीत मिली है। वह पिछली बार यहां काग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीते थे लेकिन इसबार उपचुनाव में पाला बदलकर बीजेपी प्रत्याशी बन गए। मध्य प्रदेश में दो विधानसभा सीटों में से एक पर बीजेपी और एक सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी ने जीत दर्ज की है। बीजेपी ने तेंदूखेड़ा विधानसभा उपचुनाव जीतकर यह सीट कांगेस से छीन ली है। यहां बीजेपी के भैयाराम पटेल ने कांगेस के विश्वनाथ सिंह पटेल को 13 हजार से अधिक मतों से हराया। कांगेस ने गोहद विधानसभा उपचुनाव में विजय प्राप्त कर अपनी सीट बरकरार रखी है। यहां कांगेस के रणवीर सिंह जाटव ने बीजेपी के सोबरन जाटव को 22571 मतों से पराजित किया। निर्वाचन कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, रणवीर सिंह को 55442 तथा सोबरन जाटव को 32871 मत मिले। उत्तराखंड के देहरादून जिले के विकासनगर विधानसभा क्षेत्र के लिए हुए उपचुनाव में बीजेपी उम्मीदवार कुलदीप कुमार ने जीत दर्ज की। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के नवप्रभात को 596 वोटों से हराया। राज्य निर्वाचन आयुक्त राधा रतूड़ी ने बताया कि कुलदीप कुमार को 24,934 वोट मिले। जबकि नवप्रभात के खाते में 24,338 वोट गए। इस सीट पर पिछले आम चुनाव में बीजेपी के टिकट पर विजयी रहे और इस बार निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने वाले मुन्ना सिंह चौहान तीसरे नंबर पर रहे। उन्हें सिर्फ 14,744 वोट मिले।

Sunday, September 13, 2009

तीसरे नंबर पर खिसका एक दिन का बादशाह

न्यूजीलैंड को त्रिकोणीय श्रृंखला के पहले मैच में पराजित करने के बाद पहली बार आईसीसी एकदिवसीय रैंकिंग में शीर्ष पर काबिज होने वाले भारत ने 24 घंटे के अंदर श्रीलंका के हाथों करारी हार से न सिर्फ अपनी बादशाहत गंवाई बल्कि वह आस्ट्रेलिया की इंग्लैंड पर लगातार चौथी जीत से तीसरे नंबर पर खिसक गया। भारत शुक्रवार को न्यूजीलैंड पर छह विकेट की जीत दर्ज करके एकदिवसीय रैकिंग में नंबर एक पर पहुंचा था लेकिन श्रीलंका के हाथों 139 रन की करारी हार से वह फिर से दक्षिण अफ्रीका के बाद दूसरे नंबर पर खिसक गया। रैंकिंग में उतार चढ़ाव का यह रोचक खेल यहीं पर समाप्त नहीं हुआ। भारत अभी एक पायदान नीचे खिसका ही था कि कुछ देर बाद ला‌र्ड्स में आस्ट्रेलिया ने चौथे एकदिवसीय मैच में इंग्लैंड को सात विकेट से हरा दिया। आस्ट्रेलियाई टीम ने इससे सात मैचों की श्रृंखला में 4-0 की अजेय बढ़त हासिल करने के साथ ही अपने रेटिंग अंकों की संख्या 125 पर पहुंचा दी। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की इसके बाद जारी ताजा रैंकिंग तालिका के अनुसार भारत और आस्ट्रेलिया दोनों के 125 रेटिंग अंक हैं लेकिन दशमलव में गणना करने पर भारतीय टीम तीसरे नंबर पर खिसक गई। दक्षिण अफ्रीका के अब भी 127 अंक हैं और वह फिर से शीर्ष पर काबिज हो गया है। पाकिस्तान-109 चौथे, श्रीलंका-106 पांचवें, न्यूजीलैंड-105 छठे, इंग्लैंड-104 सातवें और वेस्टइंडीज-78 आठवें नंबर पर है।

Thursday, September 3, 2009

गणपति बप्पा जाते अपने गांव


'गणपति बप्पा मोरया' के नारे के साथ मुंबई के विभिन्न जगहों पर भगवान गणेश की प्रतिमा विसर्जित कर लाखों लोगों ने उन्हें विदाई दी। सड़कों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा और गिरगाम चौपाटी, जुहू बीच और शिवाजी पार्क जैसी जगहों पर भगवान गणेश के अंतिम दर्शन के लिए लोग इकट्ठा हुए। दस दिवसीय लंबे समारोह में लाखों लोग 'लालबाग के राजा' के दर्शन के लिए उमड़े। उन्हें कल सुबह गिरगाम चौपाटी में विसर्जित किया जाएगा जबकि आज दोपहर मध्य मुंबई के लालबाग से जुलूस निकला। महानगर के 105 जगहों पर भगवान गणेश की चार हजार से ज्यादा बड़ी मूर्तियां एवं करीब 35 हजार छोटी मूर्तियां विसर्जित किए जाने की उम्मीद है। महत्वपूर्ण जगहों पर हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है और वह विसर्जन प्रक्रिया के दौरान लोगों की भीड़ पर नजर रख रहे हैं। नौसेना और तटरक्षक बल ने समुद्र तटों पर आवश्यक सहायता मुहैया कराई ताकि समारोह शांतिपूर्वक संपन्न हो जाएं।
ब्रिटेन के लीसेस्टर स्थित श्री शक्ति मंदिर में गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया गया। मंदिर में आठ फुट ऊंची गणेश प्रतिमा के दर्शन करने के लिए 18,000 से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। 1994 से यहां गणेशोत्सव मनाया जाता है। ब्रिटेन के अन्य हिस्सों में भी गणेशोत्सव मनाया गया। ब्रिटेन में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं।

वंचितों का मर्म समझते थे, हार को भी हरा देते थे


पेशे से डाक्टर रहे सच्चे और करिश्माई नेता एदुगुरी संदिंती राजशेखर रेड्डी लोगों की नब्ज पकड़ कर उनका मर्म ही नहीं मस्तिष्क तक समझने में माहिर थे और उनकी इसी विशेषता ने लाखों किसानों और मजदूरों को उनका मुरीद और आंध्र प्रदेश के सर्वोच्च पद को उनके लिए सहज बना दिया। गांव गरीब और किसान के प्रति उनका प्रेम ही 'हार को भी हराने वाले' वाईएसआर के लिए जीवन की बाजी हारने का सबब बना। अपनी अंतिम यात्रा से ठीक पहले उन्होंने मीडिया से कहा था कि मैं सूखा राहत कार्यक्रम का जायजा लेने के लिए गांवों का औचक निरीक्षण करने की योजना बना रहा हूं। आंध्र प्रदेश के कडप्पा संसदीय क्षेत्र से चार बार लोकसभा और पुलिवेंदुला से पांच बार आंध्र प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए राजशेखर रेड्डी 20 मई 2004 को राज्य के मुख्यमंत्री बने और पांच वर्ष के पहले कार्यकाल में किसानों और गरीबों के लिए शुरू की गई उनकी विकास योजनाओं ने राज्य की तस्वीर बदलने का काम किया। इसी का नतीजा था कि वह विकास की पतवार थामे एक बार फिर जनता के सामने पहुंचे और चुनावी वैतरणी पार कर गए। उन्हें इसी वर्ष 20 मई को एक बार फिर राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। सुलझे हुए और इन्सानी जज्बात को समझने वाले राजशेखर रेड्डी के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का रास्ता नेता कभी मुश्किल नहीं रहा। उन्होंने सही समय पर सही फैसले किए और कदम दर कदम सत्ता के शीर्ष की ओर बढ़ते रहे।
वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के तौर पर वाईएसआर ने राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में समाज के सबसे निचले वर्ग तक अपनी पैठ बनाने के लिए 2003 में 1400 किलोमीटर की पदयात्रा की और उनके सीधे सादे व्यक्तित्व ने लोगों के दिलों में घर कर लिया। अगले ही वर्ष उनके नेतृत्व में कांग्रेस विधानसभा चुनाव लड़कर सत्ता तक जा पहुंची। आंध्र प्रदेश के पुलिवेंदुला में वीएस राजा रेड्डी और जयम्मा के यहां आठ जुलाई 1949 को जन्मे राजशेखर को समाजसेवा का जज्बा विरासत में मिला और उन्होंने अपने छात्र जीवन से ही राजनीति के गुर सीख लिए। एमआर मेडिकल कालेज में पढ़ाई के दौरान वह छात्र संघ के नेता बने और एसवी मेडिकल कालेज तिरूपति में हाउस सर्जन एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। राजशेखर रेड्डी की धवल छवि, गहरी समझ, प्रशासनिक कौशल और उससे भी अधिक हर काम को पूरे समर्पण से करने की उनकी ईमानदारी ने उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का रास्ता दिखाया। एमबीबीएस करने के बाद वह जम्मालामदुगु मिशन अस्पताल में कुछ समय के लिए मेडिकल आफिसर के पद पर रहे। 1973 में उन्होंने अपने पिता के नाम पर पुलिवेंदुला में 70 बिस्तर का एक अस्पताल बनवाया जो आज भी चल रहा है। वाईएसआर को क्षेत्र के लोगों के इलाज के दौरान ही यह समझ में आने लगा था कि दरअसल पूरे समाज को ही इलाज और देखभाल की जरूरत है। इसीलिए उन्होंने 1978 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उनकी सेवा भावना और गरीबों की समस्या को दूर करने की ललक का ही नतीजा है कि उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन के दौरान जितने भी चुनाव लड़े, उन्हें किसी में भी हार का मुंह नहीं देखना पड़ा। उनके प्रशंसक ही नहीं बल्कि उनके विरोधी भी कहा करते थे कि वाईएसआर हार को भी हरा देते हैं।राजशेखर 1980 से 1983 के दौरान मंत्री रहे और ग्रामीण विकास, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मंत्रालय संभाले। इसके बाद उनका राजनीतिक कद और बढ़ गया और उन्हें 1983 में आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। वह 1985 तक इस पद पर रहे। 1998 से 2000 के बीच भी उन्होंने पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का पद संभाला। 1999 से 2004 के बीच वह राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे हर तरह की बनावट और लाग लपेट से दूर वाईएसआर के व्यक्तित्व में दूर से ही भारतीयता का ओज दिखाई देता था। अपने दिल की जबान बोलने वाले राजशेखर रेड्डी हमेशा हैंडलूम की धोती और कुर्ता पहनते थे। प्रशासनिक कामकाज और राजकाज के कामों में माहिर राजशेखर रेड्डी सामाजिक और कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में किसी तरह की ढील बर्दाश्त नहीं करते थे और सीधी सादी जबान बोलकर सीधी सादी जनता के सीधे दिल तक पहुंच जाते थे।

राजशेखर रेड्डी एक करिश्माई राजनेता थे


चमत्कार की उम्मीदें, उम्मीदें ही रह गईं और बुरी आशकाएं हकीकत बन गईं। हेलिकॉप्टर हादसे में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई। एस. राजशेखर रेड्डी की मौत हो गई। उनके साथ हेलिकॉप्टर में हैदराबाद से चित्तूर के लिए रवाना हुए चार अन्य लोगों की भी लाशें मिल गई हैं। इस बीच आंध्र प्रदेश के मौजूदा वित्त मंत्री के. रोसैया को राज्य का कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनाया गया है। हादसे में मुख्यमंत्री के साथ जिन लोगों की मौत हुई है, उनमें प्रधान सचिव सुब्रमण्यम , मुख्य सुरक्षा अधिकारी ए . एस . सी . वेसले , पायलट कैप्टन एस . के . भाटिया और सह-पायलट कैप्टन एम . एस . रेड्डी शामिल हैं। रेड्डी का शव हैदराबाद आज ही लाया जाएगा और पोस्टमॉर्टम किया जाएगा। वाईएसआर रेड्डी का अंतिम संस्कार कडप्पा जिले में मौजूद उनके पैतृक गांव पुलिवेंदुला में शुक्रवार को किया जाएगा। बुधवार सुबह साढ़े नौ बजे से ही मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर लापता था और उसके बाद भारत में अब तक का सबसे बड़ा सर्च ऑपरेशन चलाया गया। करीब 24 घंटे बाद गुरुवार सुबह वायु सेना की टीम को कुर्नूल से करीब 75 किलोमीटर पूरब में पहाड़ी पर हेलिकॉप्टर का मलबा मिला और थोड़ी ही देर में पांचों शव भी मिल गए।

जब आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू आईटी के रथ पर सवार होकर प्रदेश में विकास की बयार बहाने का दावा कर रहे थे , डॉक्टर येदुगुड़ी सन्दिंती राजशेखर रेड्डी उर्फ वाईएसआर ने गांव , खेत और किसानों की हिमायत की। समग्र विकास की उनकी इस अवधारणा का ही नतीजा था कि सन् 2004 में आंध्र प्रदेश पार्टी सत्ता में आई और वह मुख्यमंत्री बने। पांच साल मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने विकास के अपने इस दर्शन को कभी नहीं छोड़ा और समाज के दबे कुचले व उपेक्षित तबके की सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के जरिए राजनीति की दुनिया में खुद के लिए एक असाधारण स्थान बनाया।

डॉक्टर रेड्डी का जन्म 8 जुलाई 1949 को पिछड़ा माने जाने वाले रायलसीमा क्षेत्र के पुलिवेंदुला में हुआ था। वाईएस राजा रेड्डी के पुत्र डॉक्टर रेड्डी ने अपने स्टूडेंट लाइफ के दिनों से ही राजनीति में रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। जब वह एम । आर . मेडिकल कॉलेज , गुलमर्गा , कर्नाटक में पढ़ाई कर रहे थे तो स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष बने। एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए जम्मलमडुगु मिशन हॉस्पिटल में मेडिकल ऑफिसर के रूप में काम किया।

1973 में उन्होंने अपने पिता वाईएस राजा रेड्डी के नाम पर पुलिवेंदुला में 70 बेड वाला एक चैरिटी हॉस्पिटल भी खोला। उनके परिवार ने पुलिवेंदुला में एक पॉलिटेक्निक और एक डिग्री कॉलेज बनाया , जिन्हें बाद में प्रतिष्ठित लोयोला ग्रुप को सौंप दिया गया। डॉक्टर रेड्डी में एक बिजनेस मैन के गुण भी थे और उनकी उद्यमी कुशलताओं के साथ - साथ उनके भीतर मौजूद पारदर्शिता ने उन्हें बिजनेस की दुनिया में भी स्थापित किया। डॉक्टर रेड्डी को जनसेवा का जज्बा विरासत में मिला और उन्होंने इसी जज्बे के तहत राजनीति में 1978 में प्रवेश किया। वह चार बार राज्य विधान सभा के सदस्य रहे और चार बार ही लोकसभा के लिए भु चुने गए। डॉक्टर रेड्डी ने राज्य विधान सभा या संसद के जितने भी चुनाव लड़े , उन सभी में उन्होंने जीत हासिल की। अपने 25 वर्ष के राजनीतिक करियर में डॉक्टर रेड्डी ने अनेक भूमिकाओं में जनसेवा की है। वह 1983 से लेकर 1985 तक और फिर 1998 से लेकर 2000 तक आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष रहे। मुख्यमंत्री बनने से पहले वह कई विभागों के मंत्री भी रहे। डॉक्टर रेड्डी ने वर्ष 2003 में 1500 किलोमीटर की पदयात्रा करके आम लोगों की समस्याओं को उनकी ही भाषा में जानने - समझने की कोशिश की थी तब से वह काफी लोकप्रिय हो गए थे। उनका मानना था कि चूंकि देश की लगभग 75 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर करती है इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए ज्यादा प्रयास होने चाहिए।

Sunday, August 23, 2009

दस दिवसीय गणेश महोत्सव शुरू


गणपति बप्पा मौर्या:::महाराष्ट्र में आंतकी हमले, बारिश और स्वाइन फ्लू के डर को नजरअंदाज कर आज दस दिवसीय गणेश महोत्सव की शुरूआत हुई।करीब 5,500 'सार्वजनिक' मंडलों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा लगाई गई है तथा शहर के 88 स्थानों पर महोत्सवनुमा माहौल देखा जा रहा है। मुंबई के लाखों घरों और सार्वजनिक गणेश मंडलों में भगवान गणेश की प्रतिमा लगाई गई हैं। शहर के कई भागों में बारिश के बावजूद लोगों में महोत्सव के प्रति उत्साह देखा जा रहा है। आंतकी हमले के अलर्ट की पृष्ठभूमि में मुंबई पुलिस ने महोत्सव के मद्देनजर व्यापक सुरक्षा योजना बनाई है तथा इसके तहत महत्वपूर्ण स्थानों पर सीसीटीवी लगाए जा रहे हैं तथा निगरानी के लिए ऊंचे टावर बनाए गए हैं। महत्वपूर्ण स्थानों पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है तथा भीड़ पर नजर रखने के लिए 50 टावर बनाए गए हैं। पुलिस के मुताबिक प्रमुख गणेश मंडलों पर बम खोजी दस्ते और बम निष्क्रिय दस्तों को तैनात किया गया है एवं आयोजकों से सीसीटीवी लगाने का कहा गया है।

रहमत और बरकत से भरे रमजान के महीने का आगाज


चंद्र कैलेंडर पर टिका रमजान: मुस्लिम रमजान के लिए चंद्र कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं। रमजान उस कैलेंडर का नौंवा महीना है। चंद्र वर्ष 365 दिन के सौर वर्ष से छोटा होता है, लिहाजा पश्चिमी कैलेंडर के मुताबिक रमजान कुछ पहले शुरू हो जाता है।रोजा की वर्जनाएं: स्वस्थ्य और वयस्क लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी ग्रहण नहीं करते। पानी भी नहीं। रोजे की हालत में यौन संबंध और धूम्रपान वर्जित होता है। रोजा में रोजमर्रा के कामकाज में कोई रुकावट नहीं है। हां, यह हो सकता है कि काम के घंटे कम कर दिए जाएं।रोजे की वजह: कुरान के मुताबिक हर स्वस्थ्य मुस्लिम का यह धार्मिक कर्तव्य है। इससे व्यक्ति का शुद्धिकरण होता है और उसका ईमान पुख्ता होता है।उत्सव का माहौल: सूर्योदय के पहले हल्का खाना खाया जाता है। सूर्योदय के बाद इफ्तार और लोग नमाज पढ़ने के लिए एकत्र होते हैं। शाम को उत्सव जैसा माहौल होता है।ईद से अंत: ईद-उल-फिज के साथ ही रमजान खत्म हो जाता है। लोग नमाज पढ़ते हैं और एक-दूसरे को को तोहफे देते हैं।रहमत और बरकत से भरे रमजान के महीने का आगाज हो चुका है। मोमिनों को अल्लाह से प्यार और लगन जाहिर करने के साथ खुद को खुदा की राह की सख्त कसौटी पर कसने का मौका देने वाला यह महीना बेशक हर बंदे के लिए नेमत है। रमजान में दिन भर भूखे-प्यासे रहकर खुदा को याद करने की मुश्किल साधना करते रोजेदार को अल्लाह खुद अपने हाथों से बरकतें नवाजता है।यह महीना कई मायनों में अलग और खास है। अल्लाह ने इसी महीने में दुनिया में कुरान शरीफ को उतारा था जिससे लोगों को इल्म और तहजीब की रोशनी मिली। साथ ही यह महीना मोहब्बत और भाईचारे का संदेश देने वाले इस्लाम के सार तत्व को भी जाहिर करता है।रोजा न सिर्फ भूख और प्यास बल्कि हर निजी ख्वाहिश पर काबू करने की कवायद है। इससे मोमिन में न सिर्फ संयम और त्याग की भावना मजबूत होती है बल्कि वह गरीबों की भूख-प्यास की तकलीफ को भी करीब से महसूस कर पाता है। रमजान का महीना सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूत करने में मददगार साबित होता है। इस महीने में सक्षम लोग अनिवार्य रूप से अपनी कुल सम्पत्ति का एक निश्चित हिस्सा निकालकर उसे जकात के तौर पर गरीबों में बांटते हैं।रमजान की शुरुआत सन दो हिजरी से हुई थी और तभी से अल्लाह के बंदों पर जकात भी फर्ज की गई थी।मजान के महीने में अल्लाह के लिए हर रोजेदार बहुत खास होता है और खुदा उसे अपने हाथों से बरकत और रहमत नवाजता है।इसमें बंदे को एक रकात फर्ज नमाज अदा करने पर 70 रकात नमाज का सवाब (पुण्य) मिलता है। साथ ही इसमें शबे कद्र की रात में इबादत करने पर एक हजार महीनों से ज्यादा वक्त तक इबादत करने का सवाब हासिल होता है।कुरान शरीफ में लिखा है कि मुसलमानों पर रोजे इसलिए फर्ज किए गए हैं ताकि इस खास बरकत वाले रूहानी महीने में उनसे कोई गुनाह नहीं होने पाए। उन्होंने कहा कि यह खुदाई असर का नतीजा है कि रमजान में लगभग हर मुसलमान इस्लामी नजरिए से खुद को बदलता है।नई पीढ़ी के मुसलमानों में भी रमजान के प्रति श्रद्धा और आस्था में कोई कमी नहीं आई है।

Tuesday, August 18, 2009

जसवंत पर सवार जिन्ना का भूत




शराब और विलायती कपड़ों के बेहद शौकीन मुहम्मद अली जिन्ना ने वकालत के पेशे में जल्दी नाम कमा लिया था। 1896 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने। मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में हुई थी किंतु जिन्ना 1913 में इसमें शामिल हुए। कांग्रेस में वे जब तक रहे उन्हें धर्मनिरपेक्ष माना जाता रहा, जो हिंदू-मुस्लिम एकता की लगातार बात करता था। कांग्रेस में सात साल रहकर जब जिन्ना ने 1920 में पार्टी यह कर छोड़ी कि गांधीजी के जनसंघर्ष का सिद्धांत हिंदू-मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ाएगा। इस जनांदोलन से खाई पैदा होगी। मुस्लिम लीग ने अपने पैतरें बदले और कर डाली अलग चुनाव क्षेत्र की मांग, जबकि पंडित जवाहर लाल नेहरू संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने के पक्षधर थे। जिन्ना जब नहीं माने और धर्म व जाति के नाम पर एक समझौता हुआ। 1937 में हुए सेंटल लेजिस्लेटिव असेंबली चुनाव में मुस्लिम लीग ने कांग्रेस को कड़ी टक्कर देते हुए ज्यादातर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों पर कब्जा किया। 1930 के दशक में जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग करने लगे। 1937 में मुस्लिम लीग को पुनर्गठित कर 1940 में लाहौर प्रस्ताव पारित कर अलग देश बनाने की औपचारिक मांग तक कर डाली।जिन्ना कहीं से धर्मनिरपेक्ष नहीं लगते हैं। राजनैतिक फायदे के लिए उन्होंने धर्म का इस्तेमाल किया। पाकिस्तान बनाने के बाद जिन्ना ने कहा था कि अब यहां पर हर नागरिक सिर्फ पाकिस्तानी होगा। पंडित नेहरू ने कहा था कि जिन्ना उस शख्स की याद दिलाते हैं, जो अपने मां-बाप का कत्ल करके अदालत से इस बुनियाद पर माफी चाहता है कि वह यतीम है।फिर भाजपा नेता जसवंत सिंह को क्या सूझी थी कि उन्होंने जिन्ना को भारत का अभिन्न मित्र और पंडित नेहरू और सरदार पटेल को देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। अपनी सफाई में वह कहते हैं कि पांच साल के शोध के बाद मैंने यही पाया कि जिन्ना भारत के अभिन्न मित्र थे। इसका प्रस्तुतीकरण उन्होंने जिन्ना पर लिखी किताब में किया। इससे भाजपा में इनकी किरकिरी हो रही है। यहां तक कि भाजपा की भी बदनामी हो रही है। अब पार्टी ने जसवंत से दूरियां बनानी शुरू कर दी हैं। शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने यहां तक की दिया कि क्या जिन्ना जसवंत के रिश्तेदार लगते हैं। भाजपा में इसके पूर्व भी जिन्ना को लेकर घमासान मच चुका है जब लालकृष्ण आडवानी को पार्टी के अध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ा था। आखिरकार भाजपा के नेता लोग जिन्ना का महिमामंडप क्यों करते हैं।भारतीय जनमानस के पटल पर देश के विभाजन के लिए जिन्ना को सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है।जिन्ना-इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस नाम से जसवंत सिंह ने किताब लिखी है। धर्म के नाम पर जिन्ना और भाजपा का कोण एक जगह जरूर टकराता है। भाजपा भी धर्म के आड़ में राजनीति करती चली आ रही है। जिन्ना ने भी धर्म के नाम पर राजनीति की और मुसलमानों को एक जुट कर पाकिस्तान बना डाला। उनको धर्मनिरपेक्ष भारत पसंद नहीं आया। इस बंटवारे से जन और धन की जो हानि हुई थी उसे आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं। धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं कहा जा सकता है। सोमवार को किताब का विमोचन भी हो चुका है। मुझे तो शर्म आती है कि जसवंत को क्या सूझी थी कि उन्होंने जिन्ना पर लिखी किताब में उनका महिमामंडप किया। इससे उनका कदम छोटा अवश्य हुआ। उन्होंने जिस उद्देश्य से यह किताब लिखी है वह तो पूरा नहीं होगा।

Sunday, August 16, 2009

कर्जन की चली होती तो दिल्ली नहीं बनती राजधानी


ब्रिटिश सरकार ने अगर भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन (1899-1905) की बात मानी जाती तो दिल्ली देश की राजधानी नहीं होती। 1905 में बंगाल विभाजन करके लिए कुख्यात कर्जन देश की राजधानी को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से हटाने के खिलाफ थे। उन्होंने हाउस आफ लार्ड्स में इस मुद्दे पर खासी आपत्ति जताई थी। आखिरकार 1912 (वायसराय लार्ड हार्डिग के काल) में कलकत्ता की जगह नई दिल्ली को देश की राजधानी बनाया गया। कर्जन का मत था कि कलकत्ता से राजधानी हटाना सरकार के लिए ज्यादा नुकसानदेह होगा। हाउस आफ लार्ड्स में कर्जन ने कहा था कि समुद्र के पास होना, जूट, कोयला तथा चाय आपूर्ति के स्रोतों व इन चीजों के व्यवसायियों का उनके प्रतिष्ठानों से करीब होना कलकत्ता को महत्वपूर्ण बनाता है। कर्जन के मुताबिक यह गंभीर खतरा है। जब आप दिल्ली को अपनी राजधानी बनाएंगे तो सरकार लोगों से अलग-थलग होकर नौकरशाही से जकड़ जाएगी। दिल्ली न तो एक निर्माणकर्ताशहर बन सकती है और न वितरण का केंद्र। व्यापार के लिए राजधानी का समुद्र से नजदीकी बहुत जरूरी है।कर्जन ने ब्रिटिश सरकार को दिल्ली को राजधानी न बनाने के तीन कारण बताए थे। पहली बात यह है कि इससे सरकार की प्रतिष्ठा कम होगी। दूसरा इससे प्रशासन की कार्यक्षमता प्रभावित होगी। तीसरा, भारत में ब्रिटिश शासन सिकुड़ जाएगा। लेकिन कर्जन के तमाम तर्को के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दी।

Saturday, August 15, 2009

सूखे को झेल रहा भारत ने मनाई अपनी 63वीं आजादी







वैश्विक मंदी, कमजोर मानसून, स्वाइन फ्लू और आतंकवाद के स्याह साए के बीच रोशनी और बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ कृतज्ञ राष्ट्र ने शनिवार को 63वां स्वतंत्रता दिवस मनाया।
स्वतंत्रता दिवस का मुख्य समारोह राजधानी दिल्ली में मनाया गया जहां देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लालकिले की प्राचीर से देशवासियों को संबोधित करते हुए उन्हें आश्वस्त किया कि हालात ऐसे नहीं है कि डर और घबराहट की वजह से हमारे रोजमर्रा के काम रुक जाएं। यकीन है कि हम इन परिस्थितियों का सामना बखूबी कर पाएंगे।
उधर, देश के विभिन्न भागों में स्वतंत्रता दिवस का राष्ट्रीय पर्व परंपरागत ढंग से मनाया गया। सभी राज्यों की राजधानियों में भव्य समारोहों का आयोजन कर तिरंगा फहराया गया। प्रधानमंत्री ने देश में सूखे की स्थिति से निपटने के लिए किसानों को हर संभव मदद देने का वादा करने के साथ स्वाइन फ्लू से निपटने के लिए कारगर कदम उठाने की भी बात कही। प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था में सुधार के प्रति आशा व्यक्त करते हुए कहा कि इस वर्ष के अंत तक विकास की रफ्तार में काफी सुधार होगा। देश के 63वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रिमझिम फुहारों और 21 तोपों की सलामी के बीच ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र ध्वज तिरंगा फहराया।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण के प्रमुख बिंदु :- कालाबाजारी बर्दाश्त नहीं,-कोई भूखा नहीं रहेगा,-एच1एन1 फ्लू से भयभीत होने की जरूरत नहीं। दैनिक कामकाज बाधित नहीं होना चाहिए,-देश के हर नागरिक को समृद्ध और सुरक्षित बनाना होना और उन्हें एक सम्मानित जिंदगी देनी होगी,-नौ फीसदी की विकास दर हासिल करना सबसे बड़ी चुनौती है। हम आशा करते हैं कि इस साल के अंत तक स्थिति में सुधार होगी,-कठिन स्थिति से सामना और सामाजिक दायित्व के निर्वाह के लिए व्यापारियों और उद्योगपतियों से सहयोग की अपील,- इस साल मानसून में कमी दर्ज की गई है। सूखे से निपटने के लिए हम अपने किसानों को हर संभव सहयोग मुहैया करवाएंगे,-किसानों की ऋण अदायगी तारीख बढ़ा दी गई है। इसके अलावा किसानों को लघु काल के ऋणों पर ब्याज की अदायगी में अतिरिक्त सहयोग दिया जाएगा,- हमारे पास आनाज का पर्याप्त भंडार है। अनाजों, दालों और अन्य जरूरी चीजों की कीमतों को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे,-देश को एक और हरित क्रांति की जरूरत। कृषि चार फीसदी के विकास का लक्ष्य पांच वर्षो में हासिल कर लिया जाएगा,-खाद्य सुरक्षा कानून बनाया जाएगा जिसके तहत गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले प्रत्येक परिवार को निम्न दर पर एक निश्चित मात्रा में आनाज मिलेगा,-महिलाओं व बच्चों की जरूरतों के लिए विशेष कदम उठाए जाएंगे। मार्च 2012 तक आईसीडीएस के तहत छह साल के तक के सभी बच्चों को शामिल किया जाएगा,-नरेगा योजना में और सुधार किया जाएगा और इसे ज्यादा पारदर्शी व जिम्मेदार बनाया जाएगा,-शिक्षा का अधिकार कानून बन गया है, धन की कोई कमी नहीं होगी,-विकलांग बच्चों की जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा,-माध्यमिक शिक्षा को बढ़कर यह सुनिश्चित किया जाएगा देश के हर बच्चे को इससे लाभ मिले,- बैंक ऋण और छात्रवृत्ति अधिक से अधिक छात्रों को मुहैया करवाई जाएगी,-आर्थिक रूप से पिछले छात्रों को नई योजना के तहत कम ब्याज दर पर शिक्षा ऋण मिलेगा। इससे लिए करीब पाच लाख छात्रों को लाभ मिलेगा,-राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को शामिल किया जाएगा,-भारत निर्माण के लिए अतिरिक्त कोष आवंटित किया जाएगा,- भौतिक आधारभूत सुविधाओं के विकास में तेजी लाई जाएगी और प्रति दिन 20 किलो मीटर राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण होगा,- रेलवे ने फ्रेट कॉरीडोर पर काम शुरू कर दिया है।,-जम्मू एवं कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में सड़क, रेल और विमान परियोजनाओं का विस्तार होगा,-देश को झुग्गी-झोपड़ी मुक्त बनाने के लिए राजीव आवास योजना की शुरुआत,-भारत जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटेगा,- जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय सौर्य ऊर्जा मिशन की शुरुआत 14 नवंबर को होगी,-ऊर्जा संरक्षण की एक नई संस्कृति की जरूरत।

Thursday, August 6, 2009

धुंधला दिखा चंद्रग्रहण


पीली आभा से दमकता पूर्ण चंद्रमा आज सुबह उपच्छाया ग्रहण के असर से हल्के लाल रंग का हो गया। इस ग्रहण का विश्वभर के वैज्ञानिकों और शौकिया खगोलविदों ने बारीकी से निरीक्षण किया। चंद्र ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा इस तरह से धरती के पीछे आ जाता है कि धरती सूर्य की किरणों के चांद तक पहुंचने में अवरोध लगा देती है। उपच्छाया चंद्र ग्रहण में धरती की परछाई का हल्का हिस्सा चंद्रमा पर पड़ता है। ग्रहण सुबह चार बजकर 34 मिनट 17 सेकेंड पर शुरू हुआ और सुबह सात बजकर 34 मिनट नौ सेकेंड पर खत्म हुआ। ग्रहणीय संयोजन सुबह साढ़े छह बजे हुआ, जबकि ग्रहण सुबह छह बजकर 10 मिनट 11 सेकेंड पर अपने चरम पर था। ग्रहण के दौरान चंद्रमा मकर राशि तारामंडल में था, इसलिए यूरोप, दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका में यह स्पष्ट रूप से नजर आया। चंद्रग्रहण को पूर्वी उत्तर अमेरिका में उगते हुए और एशिया में ढलते हुए देखा गया।यह ग्रहण 0.899 मैग्नीट्यूड के साथ वर्ष का सबसे धुंधला उपच्छाया ग्रहण था। इस साल गत 22 जुलाई को हुआ पूर्ण सूर्य ग्रहण दो उपच्छाया चंद्र ग्रहणों के बीच पड़ा था। एक उपच्छाया चंद्र ग्रहण गत सात जुलाई को हुआ था ्र जबकि दूसरा आज पड़ा। इससे पहले इस तरह का अंतिम उदाहरण 1908 में देखने को मिला था और इस तरह का अगला उदाहरण 2074 में देखने को मिलेगा। देश नौ फरवरी और सात जुलाई को पहले ही दो उपच्छाया चंद्र ग्रहण देख चुका है। एक और आंशिक चंद्र ग्रहण 31 दिसंबर को पड़ेगा। 22 जुलाई को लोगों ने पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा था जो अब 123 साल बाद दिखेगा।

Wednesday, August 5, 2009

राष्ट्र ने मनाया पारंपरिक तरीके से रक्षाबंधन


भाई और बहन के अटूट संबंधों को दर्शाने वाला त्यौहार रक्षाबंधन आज राष्ट्र पारंपरिक उत्साह के साथ मना रहा है। बहिनों ने भाइयों के तिलक लगाकर राखियां बांधी और खुशहाली की प्रार्थनाएं की और उपहारों का आदान-प्रदान खूब हुआ।स्कूलों के बच्चों ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को राखियां बांधीं। बदले में छात्रों को राष्ट्रपति ने एक सांकेतिक तोहफा और नाश्ते का पैकेट दिया। इसके अतिरिक्त उन्हें राष्ट्रपति भवन की सैर कराई गई। राष्ट्रपति की कलाई पर राखी बांधने वाली एक नेत्रहीन लड़की ने कहा कि मैं उन्हें देख नहीं सकी लेकिन अपने गाल पर उनके स्पर्श को मैंने महसूस किया। काश मैं इस क्षण को देख सकती। विभिन्न स्कूलों और गैर सरकारी संगठनों से जुड़े बच्चों ने प्रधानमंत्री की कलाई पर राखी बांधी और उन्हें मिठाइयां खिलाईं। इस अवसर पर दिए गए संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि इस त्योहार से हमारे पारंपरिक संबंधों की पवित्रता को बल मिलता है। उन्होंने कहा कि इससे मतभेद दूर करने तथा बंधुत्व और भाईचारे के संबंधों को मजबूत करने का अवसर मिलता है।रक्षाबंधन के अवसर पर विभिन्न कार्यालयों में महिला कर्मी छुट्टी पर थीं। इस अवसर पर जब रक्षाबंधन से संबंधित फिल्मी गाने दिल को छूने वाले बजते हैं तो मन भावुक हो जाता है। जैसे भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना.. राखी बंधवालो मेरे वीर..भइया मेरे छोटी बहन को न भुलाना..आदि गानों के साथ जब राखी बांधी जाती है तो वास्तव में भाई-बहन का असली प्रेम सामने आ ही जाता है। यही है इस त्यौहार का असली मकसद।

Sunday, August 2, 2009

राखी के बंधन को निभाना


इंतजार करते-करते आ गया रक्षाबंधन। प्यारी-प्यारी राखी अपने भाई की कलाई पर बांधने के बाद किसी भी बहन को इंतजार रहता है तो सिर्फ उस नेग का जिसे वह बेसब्री से इंतजार करती है। राखी की सबसे लोकप्रिय कथा राजनीतिक हित सिद्धि से जुड़ी है। जब ग्रीस के राजा सिकंदर और हिंदू राजा पोरस के बीच युद्ध मैदान में सिकंदर की पत्‍नी ने राजा पोरस को राखी के रूप में धागा भेजकर यह नेग मांगा कि आप मेरे पति सिकंदर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। पोरस ने किया भी ऐसा ही था। उसने राखी की लाज रखी और युद्ध मैदान से हट गया। महाभारत युद्ध की शुरूआत में ही द्रोपदी ने कृष्ण को राखी बांधकर भाई मान लिया था और कृष्ण ने महाभारत युद्ध में पांडवों का साथ दिया था। बाली भगवान विष्णु का परम भक्त था, एक दिन उसने विष्णु से कहा कि आप मेरे राज्य से निकल जाइए। यह सुनकर भगवान विष्णु की पत्‍‌नी लक्ष्मी जी दुखी हुई क्योंकि वह घर नहीं छोड़ना चाहती थीं। लक्ष्मी जी बाली के पास राखी का धागा लेकर पहुंची और बाली के कलाई पर बांध दिया और नेग मांगा कि आप घर छोड़ने के लिए नहीं कहेंगे। बाली खुद विष्णु के पास गया और कहा कि आप घर नहीं छोड़ेंगे। सोलहवीं सदी में राजस्थान के चित्तौड़ घराने की रानी कर्णवती ने मुस्लिम शासक हुमायूं को राखी के रूप में रेशमी धागा तब भेजा था जब गुजरात का बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की धमकी दी थी। राखी पाकर हुमायूं चित्तौड़ को बचाने के लिए गया था, लेकिन तब तक चित्तौड़ लुट चुका था। चित्तौड़ की रानी समेत 1,30,000 राजपूत महिलाओं के साथ जौहर अर्थात आत्महत्या कर ली थी।रक्षाबंधन सावन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। उत्तरी भारत में इसे राखी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। जबकि पश्चिमी भारत महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात में नारियल पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। देश के केंद्रीय हिस्सों में कजरी पूर्णिमा के नाम से लोग पर्व मनाते हैं। दक्षिण भारत में इसे अवानी अविट्टम, उपकर्म के नाम से मनाते हैं। गुजरात के कुछ हिस्सों में इसे पवित्रोपड़ के नाम से मनाते हैं। इस दिन भगवान शिव की पूजा करते हैं।भारत देश इतना बड़ा है कि एक ही पर्व अनेक नामों से जाना जाता है। भाई और बहनों का अब यह पर्व आधुनिक बनता जा रहा है।अब बहनें अपने भाइयों से अच्छे उपहारों की उम्मीद रखती हैं। यदि चार भाई हैं और तीन भाई इस दिन को बहिन को अच्छा उपहार देते हैं, चौथा भाई की स्थिति अच्छी नहीं है वह शर्म की वजह से बहिन के घर जाने में संकोच करता है। सच्चाई तो यह है कि इन कीमती उपहारों ने राखी के बंधन के महत्व को कम करके उपहार बंधन का रूप धारण कर लिया। राखियां भी अब सादा नहीं रहीं। हम चाहते हैं कि यह त्योहार फिर से वही रूप ले जो पहले जाति-धर्म से हटकर बहनें अपनी रक्षा के लिए भाई की कलाई पर सिर्फ एक धागा बांधती थी। भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना।

Wednesday, July 29, 2009

राजमाता गायत्री देवी नहीं रहीं


दुनिया की दस सबसे खुबसूरत महिलाओं में एक रही जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी का आज लम्बी बीमारी के बाद यहां के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 90 साल की थी। गायत्री देवी को पेट और आंत की बीमारी के कारण लंदन से यहां लाकर सीधे अस्पताल में भर्ती करवाया गया था।गायत्री देवी पिछले तीन दिनों से घर जाने का आग्रह कर रही थीं लेकिन उनके स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हे छुटटी नहीं दी गई और दोपहर बाद उनका निधन हो गया। गायत्री देवी जयपुर की तीसरी महारानी थी और सवाई मान सिंह (द्वितीय) की पत्नी थीं।गायत्री देवी के पिता कूचबिहार के राजा थे। गायत्री देवी वर्ष 1939 से 1970 के बीच जयपुर की तीसरी महारानी थीं। उनका विवाह महाराज सवाई मान सिंह द्वितीय से हुआ। गायत्री देवी अपने अप्रतिम सौन्दर्य के लिए जानी जाती थीं। वह एक सफल राजनीतिज्ञ भी रहीं। यही वजह थी कि वह अपने समय की फैशन आइकन मानी जाती थीं। राजघरानों के भारतीय गणराज्य में विलय के बाद गायत्री देवी राजनीति में आयीं और जयपुर से वर्ष 1962 में मतों के भारी अंतर से लोकसभा चुनाव जीता। गायत्री देवी का जन्म 23 मई 1919 को हुआ था। वह अपने जमाने में दुनिया भर में अपनी अद्वितीय सुन्दरता के लिए चर्चा में रहीं। यही कारण था कि दुनिया की खूबसूरत दस महिलाओं में गायत्री देवी शामिल थीं। पूर्व महारानी ने सुन्दरता की दौड़ में अव्वल रहने के साथ साथ राजनीति क्षेत्र में भी अपना परचम लहराया और वर्ष 1967 और 1971 में भी उन्होंने जयपुर से लोकसभा सीट पर भारी मतों से जीत अर्जित की।लंदन में जन्मी गायत्री देवी कूच बिहार के महाराज जितेन्द्र नारायण की पुत्री थीं। उनकी मां राजकुमारी इन्दिरा राजे बडौदा की राजकुमारी थीं। गायत्री की आरभिंक शिक्षा शान्तिनिकेतन में हुई। बाद में उन्होंने स्विटजरलैंड के लाजेन में अध्ययन किया। उनका राजघराना अन्य राजघरानों से कहीं अधिक समृद्धशाली था। घुड़सवारी की शौकीन रही पूर्व राजमाता का विवाह जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के साथ हुआ। गायत्री ने 15 अक्टूबर 1949 को पुत्र जगत सिंह को जन्म दिया। महारानी गायत्री देवी को बाद में राजमाता की उपाधि दी गई। जगत सिंह का कुछ साल पहले ही निधन हो गया था। जगत सिंह जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह के सौतेले भाई थे। गायत्री देवी की शुरू से ही लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने में रुचि रही यही कारण रहा कि गायत्री देवी ने गायत्री देवी ग‌र्ल्स पब्लिक स्कूल की शुरूआत की। इस स्कूल की गणना जयपुर के सर्वोत्तम स्कूलों में आज भी है। पूर्व राजमाता ने जयपुर की 'ब्लू पोटरी' कला को भी जमकर बढ़ावा दिया। वह समाज सेवा से भी जुड़ी रहीं।

Sunday, July 26, 2009

कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि, ये मेरे वतन के लोगो जरा याद करो कुर्बानी


कारगिल युद्ध की 10वीं वर्षगांठ पर शहीदों को आज पूरा राष्ट्र नम भरी आंखों के साथ श्रद्धांजलि दे रहा है।
देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ऐसे शहीदों को मैं शेल्यूट करता हूं, जिन्होंने राष्ट्र के रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि दी। लड़ाई की वजह थी कि वर्ष 1999 की गर्मियों में जम्मू एवं कश्मीर में कारगिल की पहाडि़यों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा जमा लिया था।कारगिल की चोटियों को दुश्मन से मुक्त कराने के लिए दस साल पहले हुई लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए सेनानियों के परिजनों के आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरों पर विजय का गर्व साफ साफ झलका। उनके लाडलों ने देश के लिए अपना सर्वोत्तम बलिदान दिया था। 26 जुलाई 1999 को शुरू हुई यह लड़ाई 59 दिन तक चली। लड़ाई में भारतीय सेना ने बटालिक, कारगिल और द्रास सेक्टरों में पाकिस्तानियों की कमर बुरी तरह तोड़ दी थी। 26 जुलाई 1999 को भारतीय बलों ने अपनी विजय की घोषणा की। आज राष्ट्र कारगिल फतह को विजय दिवस के रूप में मना रहा है।10 साल पहले युद्ध में सेना के 610 अधिकारियों और कर्मियों ने बलिदान दिया जिनमें वायु सेना के पांच कर्मी तथा दो नागरिक भी शामिल थे। कारगिल लड़ाई विश्व के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में से एक में लड़ी गई जिसके चलते भारत के लोग इस तरह एक होकर खड़े हो गए कि ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया। उस समय उमड़े राष्ट्रभक्ति के अपार ज्वार से देश मजबूत हुआ। भारतीय सेना दुश्मन के छक्के छुड़ाने में सक्षम है। मुझे अपनी सेना पर गर्व है। लेकिन मैं इतना ही कहूंगा कि जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी,ये मेरे वतन के लोगो, जरा आंख में भर लो पानी।