Sunday, August 16, 2009

कर्जन की चली होती तो दिल्ली नहीं बनती राजधानी


ब्रिटिश सरकार ने अगर भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन (1899-1905) की बात मानी जाती तो दिल्ली देश की राजधानी नहीं होती। 1905 में बंगाल विभाजन करके लिए कुख्यात कर्जन देश की राजधानी को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से हटाने के खिलाफ थे। उन्होंने हाउस आफ लार्ड्स में इस मुद्दे पर खासी आपत्ति जताई थी। आखिरकार 1912 (वायसराय लार्ड हार्डिग के काल) में कलकत्ता की जगह नई दिल्ली को देश की राजधानी बनाया गया। कर्जन का मत था कि कलकत्ता से राजधानी हटाना सरकार के लिए ज्यादा नुकसानदेह होगा। हाउस आफ लार्ड्स में कर्जन ने कहा था कि समुद्र के पास होना, जूट, कोयला तथा चाय आपूर्ति के स्रोतों व इन चीजों के व्यवसायियों का उनके प्रतिष्ठानों से करीब होना कलकत्ता को महत्वपूर्ण बनाता है। कर्जन के मुताबिक यह गंभीर खतरा है। जब आप दिल्ली को अपनी राजधानी बनाएंगे तो सरकार लोगों से अलग-थलग होकर नौकरशाही से जकड़ जाएगी। दिल्ली न तो एक निर्माणकर्ताशहर बन सकती है और न वितरण का केंद्र। व्यापार के लिए राजधानी का समुद्र से नजदीकी बहुत जरूरी है।कर्जन ने ब्रिटिश सरकार को दिल्ली को राजधानी न बनाने के तीन कारण बताए थे। पहली बात यह है कि इससे सरकार की प्रतिष्ठा कम होगी। दूसरा इससे प्रशासन की कार्यक्षमता प्रभावित होगी। तीसरा, भारत में ब्रिटिश शासन सिकुड़ जाएगा। लेकिन कर्जन के तमाम तर्को के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दी।

3 comments:

राहुल सि‍द्धार्थ said...

इतिहास की गलियों में ले जाकर महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए धन्यवाद....

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही रोचक इतिहास से सम्बंधित नई जानकारी देने के लिए आभार .

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही रोचक इतिहास से सम्बंधित नई जानकारी देने के लिए आभार .