Thursday, January 29, 2009

भाईचारे में डूबे गांधीजी को विभाजन मंजूर न था


रघुपति राघव राजा राम गाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को रामनाम पर इस कदर भरोसा था कि वह कई बार बीमारी की स्थिति में भी उपचार के बदले रामनाम पर जोर देते थे और उन्होंने कई दफा अपनी इस भावना को व्यक्त भी किया। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि बचपन में उन्हें भूत-प्रेत आदि से डर लगता था और इस डर को दूर करने के लिए वह रामनाम जपते थे। बचपन के भय से ही राम के प्रति लगाव का उनमें बीजारोपण हुआ। गांधीजी के आखिरी दिनों में उनके साथ रही उनकी पौत्री मनुबेन ने अपनी पुस्तक 'बापू मेरी मां' में उल्लेख किया है कि नोआखाली में आमकी नामक गांव में वे ठहरे हुए थे। वहीं उनकी तबीयत खराब हो गयी और वह बेहोश हो गए। तबीयत खराब होते ही मनु घबरा गयीं और अन्य लोगों को बुलाने लगीं। थोड़ी देर बाद होश आने पर बापू ने मनु से कहा कि वह उद्यम उन्हें अच्छा नहीं लगा। तुमसे मेरी उम्मीद यही है कि तुम और कुछ न करके सिर्फ सच्चे दिल से रामनाम लेती रहो-मेरा सच्चा डाक्टर तो मेरा राम ही है। जहां तक उसे मुझसे काम लेना होगा वहां तक वह मुझे जिलाएगा नहीं तो उठा लेगा। मनुबेन के अनुसार उसी दिन बापू ने एक बीमार बहन को पत्र लिखकर कहा कि संसार में अगर कोई अचूक दवाई है तो वह रामनाम है। यह घटना तीस जनवरी उन्नीस सौ सैंतालीस की थी यानी बापू की मृत्यु से ठीक एक साल पहले। उन्होंने लिखा है कि रामनाम में यह श्रद्धा आखिर तक बनी रही। तीस जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को उन्होंने मनु से कहा था कि आखिर दम तक हमें रामनाम रटते रहना चाहिए। वह दिन बापू का आखिरी दिन साबित हुआ। महात्मा गांधी ने सत्य के साथ प्रयोग और आत्मकथा में भी ऐसा ही जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि उन्हें भूत प्रेत आदि से डर लगता था। उनकी धाय रंभा ने बताया कि इसकी दवा रामनाम है। उन्होंने आगे लिखा है कि मुझे रामनाम से अधिक श्रद्धा रंभा पर थी। इसलिए बचपन में भूत प्रेत आदि के भय से बचने के लिए मैंने रामनाम जपना शुरू किया। यह जप बहुत समय नहीं चला। पर बचपन में जो बीच बोया वह नष्ट नहीं हुआ। आज रामनाम मेरे लिए अमोघ शक्ति है। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि बचपन में जिस चीज का उनके मन पर गहरा असर पड़ा वह था रामायण पारायण। तेरह साल की उम्र में उन्हें रामचंद्रजी के परम भक्त लाधा महाराज से रामायण सुनने का मौका मिला। वे दोहा चौपाई गाते और अर्थ समझाते। स्वयं उसके रस में लीन हो जाते और श्रोताओं को भी लीन कर देते। उनके पाठ में मुझे खूब रस आता था। यह श्रवण रामायण के प्रति मेरे अत्यधिक प्रेम की बुनियाद है। मैं तुलसीदास की रामयाण को भक्तिमार्ग का सर्वोत्तम ग्रंथ मानता हूं। गांधी की हत्या के बाद जो प्राथमिकी दर्ज करायी गयी उसमें दर्ज मनुबेन के बयान के मुताबिक गोली लगने के बाद राष्ट्रपिता के मुंह से रामनाम ही निकला। शांति के लिए नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने की प्रमुख वजह अफ्रीका प्रवास के वक्त अफ्रीकियों के लिए संघर्ष नहीं करने और सिर्फ भारतीयों के हित की आवाज उठाने के आरोपों पर स्वयं सफाई देते हुए महात्मा गांधी ने स्पष्ट किया था कि उस देश में भारतीय खुद ही काफी दयनीय स्थिति में थे और वहां के मूल निवासी उस समय संघर्ष के लिए तैयार नहीं थे। गांधी ने अपने सहयोगी और शांति निकेतन में शिक्षाविद् रहे काका साहब कालेलकर के साथ बातचीत के क्रम में अफ्रीका की घटना का जिक्र आने पर यह सफाई दी थी जिसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है। नोबेल पुरस्कार के लिए कई बार नामित होने के बावजूद महात्मा गांधी को नोबेल पुरस्कार समिति ने दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकियों के लिए आवाज नहीं उठाने और असहयोग आंदोलन के दौरान हिंसक चौरीचौरा कांड के मद्देनजर नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनका चयन नहीं किया था। वर्ष उन्नीस सौ सैंतीस की नोबेल पुरस्कार समिति के सलाहकार जैकब वर्ममूलर ने गांधी के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें इन कारणों का उल्लेख किया गया। अफ्रीका प्रवास के दौरान अफ्रीकियों के लिए संघर्ष नहीं करने और केवल भारतीयों के हितों के लिए आवाज उठाने के आरोपों पर महात्मा गांधी ने अपने सहयोगी तथा शांति निकेतन के शिक्षाविद् रहे पद्म भूषण काका साहब कालेलकर को बताया था कि यह मेरे आत्मसंयम को दर्शाता है। दक्षिण अफ्रीका में हम भारतीय खुद ही काफी दयनीय स्थिति में थे। हमें अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। गांधी ने कहा था कि अगर मैं अफ्रीकियों के लिए आवाज उठाता तो इससे कोई मकसद हल नहीं होता क्योंकि अफ्रीकी उस समय संघर्ष के लिए तैयार नहीं थे। बापू ने कालेलकर को बताया था कि मुझे विश्वास था कि अगर मैं अफ्रीका में अहिंसा के जरिये भारतीयों के लिए न्याय सुनिश्चित करने में सफल रहा तो इससे अफ्रीकियों को जागृति का मौन संदेश मिल जाएगा। प्रसिद्ध गांधीवादी, शिक्षाविद् तथा स्वतंत्रता सेनानी जेबी कृपलानी ने महात्मा गांधी पर अपनी पुस्तक में लिखा कि जब कोई विदेशी सत्य और अहिंसा पर संदेश देने के लिए बापू से सम्पर्क करता था तो उनका जवाब होता था-पहले मुझे भारत में बेहतर साबित होने दें तो पूरे विश्व को खुद ब खुद संदेश मिल जायेगा क्योंकि पूरा विश्व आपस में जुड़ा हुआ है। खुलापन और एक विश्व की बापू की परिकल्पना अनोखी थी। बापू ने बारह जनवरी उन्नीस सौ अट्ठाईस को यंग इंडिया में लिखा था कि मेरा लक्ष्य भारत की आजादी से कहीं बड़ा है। भारत को विदेशी दासता से मुक्त करा कर मैं पृथ्वी पर कमजोर वर्ग को दमन के खिलाफ आवाज बुलंद करने और समग्र विकास की दिशा में अग्रसर होने का संदेश देना चाहता हूं। महात्मा गांधी के जीवन दर्शन में एक विश्व खुलापन और विश्व शांति के तत्व सन्निहित हैं और इसी दर्शन के अनुरूप उन्होंने जर्मनी के खिलाफ ब्रिटेन की मदद का वायदा और भारत के विभाजन का विरोध किया। कालेलकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि महात्मा गांधी के लेखों, भाषणों,विचार और दर्शन पर गौर करें तो स्पष्ट है कि उन्होंने एक विश्व खुलापन और विश्व शांति की अवधारणा को आत्मसात किया था। कालेलकर ने लिखा कि बापू ने मुझे बताया कि उन्नीस सौ पन्द्रह में जर्मनी के खिलाफ ब्रिटेन के नेतृत्व वाली मित्र सेना को मदद के वादे के पीछे हमारा उद्देश्य जर्मनी को पूर्ण बर्बादी से बचाना है। गांधी ने काका कालेलकर को बताया कि ब्रिटेन की मदद करके ही हम शांति सम्मेलन में बैठ सकते हैं और ब्रिटेन को बता सकते हैं कि जर्मन भी उनके भाई ही हैं और हमें एक विश्व व्यवस्था में रहना सीखना चाहिए। खुले विश्व की परिकल्पना के आधार पर ही महात्मा गांधी ने भारत के विभाजन का विरोध किया था। वसुधैव कुटुम्बकम और मानवता पर आधारित भाईचारे में दृढ़ विश्वास रखने वाले बापू हिन्दू और मुसलमान के आधार पर भारत के दो देश के रूप में विभाजन को कैसे स्वीकार कर सकते थे।

2 comments:

अनिल कान्त : said...

राम नामक दवाई मन को सुकून देती है .....अच्छी बात है ....यकीनन अच्छा लेख ...किंतु इसके साथ ही डॉक्टर और दवा की जरूरत तो पड़ती ही है ....वरना खाम खां ....इतने बच्चे डॉक्टर बन्ने के लिए मेहनत न करते ......


अनिल कान्त

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

AKSHAT VICHAR said...

मोर मनोरथ जानहु नीके बसहुं सदा उरपुर सबहींके