Thursday, July 1, 2010

कामयाब नहीं रहा शिमला समझौता

भारत और पाकिस्तान के रिश्ते में अमन-चैन कायम करने के मकसद से दो जुलाई, 1972 को हुआ शिमला समझौता अपना लक्ष्य पाने में कुछ हद तक ही कामयाब रहा है।समझौते का मकसद भारत और पाकिस्तान के रिश्ते में पड़ी दरार को कूटनीतिक तरीके से पाटना था लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो सका और आज यह पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है।यदि कूटनीतिक नजरिए से देखें तो शिमला समझौता बहुत अच्छा कदम नहीं था। इस समझौते का विरोध तत्कालीन विपक्षी दलों ने भी किया था और देश में इस पर आम सहमति नहीं बन पाई थी।उस समय इस समझौते के विरोध में जनसंघ ने एक नारा दिया था देश न हारी..फौज न हारी, हारी है सरकार हमारी।यह समझौता आज राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से कोई मायने नहीं रखता लेकिन यह सच है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्ते कायम करने की कोशिशों की बुनियाद इसी समझौते ने रखी थी। इस समझौते के बाद भी कई दफा पाकिस्तान के साथ रिश्तों की बेहतरी के प्रयास किए गए लेकिन हालात अभी तक जस के तस हैं। शिमला समझौता रूपी आधार का इस्तेमाल कर दोनों देशों के संबंध मधुर बन सकते हैं।इस समझौते की सबसे बड़ी खामी यह थी कि इसमें 'सियाचिन ग्लेशियर-सालतोरो रिज' की लाइन को परिभाषित नहीं किया गया था।1984 में भारत ने इस क्षेत्र में अपनी सेना तैनात की और फिर पाक ने भी यहां अपनी सेना तैनात कर दी। दोनों देशों की ओर से सेना की तैनाती के बाद यह क्षेत्र दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र बन गया।

1 comment:

अनामिका की सदाये...... said...

आपकी पोस्ट कल २/७/१० के चर्चा मंच पर ली जायेगी.

http://charchamanch.blogspot.com/

आभार..

अनामिका.