Thursday, May 20, 2010

राजीव गांधी का पंचायती राज का अधूरा सपना: राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई पर विशेष:


पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासनकाल में त्रिस्तरीय पंचायती राज संबंधी जो ऐतिहासिक कानून बनाया गया उसके बारे में आज विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भले ही सत्ता के विकेंद्रीयकरण और महिलाओं के सशक्तीकरण में काफी मदद मिली हो लेकिन आज भी कई लक्ष्य हासिल किए जाने बाकी हैं तथा इसके लिए मजबूत निगरानी प्रणाली की जरूरत है।त्रिस्तरीय पंचायती राज लागू होने के कारण लोकतंत्र को लोगों के द्वार तक पहुंचा दिया गया। इससे निर्णय प्रक्रिया में जन भागीदारी बढ़ी है। लेकिन राजीव गांधी सहित जिन लोगों ने पंचायती राज व्यवस्था के लिए जो लक्ष्य सोचे थे वे अभी तक भ्रष्टाचार, लालफीताशाही आदि के कारण दूर का ख्वाब बने हुए हैं।निस्संदेह राजीव गांधी सरकार के शासनकाल में पारित किए गए पंचायती राज संबंधी कानून के कारण लोकतंत्र को चुस्त बनाने में काफी मदद मिली। आज देश में ढाई लाख पंचायतें एवं 32 लाख चुने हुए प्रतिनिधि हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें 12 लाख महिलाएं चुनकर आई हैं।पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उम्मीदवारों की भागीदारी काफी बढ़ी है, जो हमारे लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है।इन सबके बावजूद पंचायती राज के बारे में राजीव गांधी का जो सपना था, वह अभी तक अधूरा है। व्यावहारिक स्तर पर देखने में आता है कि पंचायती राज संस्थाओं की विकास योजनाओं में नौकरशाही अड़चनें पैदा करती है। इसके अलावा पंचायती राज संस्थाओं के मामले में कई राज्य सरकारों का रवैया उपेक्षापूर्ण रहता है।यदि सांसद, विधायक एवं राज्य सरकारें पंचायती राज संस्थाओं के मामले में अधिक रुचि दिखाए तो इन संस्थाओं के माध्यम से जमीनी स्तर पर विकास के कार्यो को तेज गति से अंजाम दिया जा सकता है।भले ही सरकार के शासनकाल में पंचायती राज संबंधी कानून संसद में पारित किया गया हो लेकिन इसका सारा श्रेय उन्हें ही नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख नेताओं ने इसका स्वप्न देखा था। यदि पंचायती राज संस्थाएं आज ढंग से काम नहीं कर पा रही हैं तो इसके लिए कांगे्स अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती क्योंकि कानून लागू होने के बाद करीब सवा दशक तक उनकी सरकार केंद्र में रही।राजीव गांधी कहते थे कि केंद्र से जारी किए गए एक रुपये में से मात्र 15 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं। अब उनके पुत्र राहुल गांधी कह रहे हैं कि जनता तक मात्र दस पैसे ही पहुंच पा रहे हैं। स्थिति में जो गिरावट आई है क्या कांगे्स शासित सरकारें उसके लिए दोषी नहीं हैं।आज इस बात की बेहद जरूरत है कि पंचायती राज संस्थाओं द्वारा कराए जाने वाले कामकाज की 'सोशल आडिट' हो। इससे उनकी जवाबदेही बढ़ेगी। सोशल आडिट नौकरशाहों की बजाय जन प्रतिनिधियों, विशेषज्ञों से करवाया जाना चाहिए।ग्रामीण आबादी शहरों की तरफ नहीं भागे, यह सुनिश्चित करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाना बेहद जरूरी है। राजीव गांधी ने इसी लक्ष्य के साथ संबंधित कानून बनाने की पहल की थी।राजीव गांधी चाहते थे कि पंचायती राज संस्थाओं को विकास के विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल किया जाए। इसके लिए जरूरी है कि विभिन्न मंत्रालयों की योजनाओं को इन संस्थाओं के जरिए लागू करवाया जाए। इससे गांवों के विकास में मदद मिलेगी।आज जमीनी स्तर पर इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि पंचायती राज संस्थाओं द्वारा खर्च किए जा रहे धन और कराए जा रहे कार्यो की कड़ी निगरानी करवाई जाए। इस पर निगरानी से ठोस कार्य सुनिश्चित होंगे।

2 comments:

honesty project democracy said...

जमीर और ईमानदारी का अभाव और उसपर भूखमरी फ़ैलाने की साजिश ने इस देश में हर राज और यहाँ तक की इंसानियत को भी खत्म करने पे तुली है / हम चाहते हैं की इंसानियत की मुहीम में आप भी अपना योगदान दें / पढ़ें इस पोस्ट को और हर संभव अपनी तरफ से प्रयास करें ------ http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.html

Goalpara Region & Goalparia Folk Songs said...

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