Wednesday, July 29, 2009

राजमाता गायत्री देवी नहीं रहीं


दुनिया की दस सबसे खुबसूरत महिलाओं में एक रही जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी का आज लम्बी बीमारी के बाद यहां के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 90 साल की थी। गायत्री देवी को पेट और आंत की बीमारी के कारण लंदन से यहां लाकर सीधे अस्पताल में भर्ती करवाया गया था।गायत्री देवी पिछले तीन दिनों से घर जाने का आग्रह कर रही थीं लेकिन उनके स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हे छुटटी नहीं दी गई और दोपहर बाद उनका निधन हो गया। गायत्री देवी जयपुर की तीसरी महारानी थी और सवाई मान सिंह (द्वितीय) की पत्नी थीं।गायत्री देवी के पिता कूचबिहार के राजा थे। गायत्री देवी वर्ष 1939 से 1970 के बीच जयपुर की तीसरी महारानी थीं। उनका विवाह महाराज सवाई मान सिंह द्वितीय से हुआ। गायत्री देवी अपने अप्रतिम सौन्दर्य के लिए जानी जाती थीं। वह एक सफल राजनीतिज्ञ भी रहीं। यही वजह थी कि वह अपने समय की फैशन आइकन मानी जाती थीं। राजघरानों के भारतीय गणराज्य में विलय के बाद गायत्री देवी राजनीति में आयीं और जयपुर से वर्ष 1962 में मतों के भारी अंतर से लोकसभा चुनाव जीता। गायत्री देवी का जन्म 23 मई 1919 को हुआ था। वह अपने जमाने में दुनिया भर में अपनी अद्वितीय सुन्दरता के लिए चर्चा में रहीं। यही कारण था कि दुनिया की खूबसूरत दस महिलाओं में गायत्री देवी शामिल थीं। पूर्व महारानी ने सुन्दरता की दौड़ में अव्वल रहने के साथ साथ राजनीति क्षेत्र में भी अपना परचम लहराया और वर्ष 1967 और 1971 में भी उन्होंने जयपुर से लोकसभा सीट पर भारी मतों से जीत अर्जित की।लंदन में जन्मी गायत्री देवी कूच बिहार के महाराज जितेन्द्र नारायण की पुत्री थीं। उनकी मां राजकुमारी इन्दिरा राजे बडौदा की राजकुमारी थीं। गायत्री की आरभिंक शिक्षा शान्तिनिकेतन में हुई। बाद में उन्होंने स्विटजरलैंड के लाजेन में अध्ययन किया। उनका राजघराना अन्य राजघरानों से कहीं अधिक समृद्धशाली था। घुड़सवारी की शौकीन रही पूर्व राजमाता का विवाह जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के साथ हुआ। गायत्री ने 15 अक्टूबर 1949 को पुत्र जगत सिंह को जन्म दिया। महारानी गायत्री देवी को बाद में राजमाता की उपाधि दी गई। जगत सिंह का कुछ साल पहले ही निधन हो गया था। जगत सिंह जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह के सौतेले भाई थे। गायत्री देवी की शुरू से ही लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने में रुचि रही यही कारण रहा कि गायत्री देवी ने गायत्री देवी ग‌र्ल्स पब्लिक स्कूल की शुरूआत की। इस स्कूल की गणना जयपुर के सर्वोत्तम स्कूलों में आज भी है। पूर्व राजमाता ने जयपुर की 'ब्लू पोटरी' कला को भी जमकर बढ़ावा दिया। वह समाज सेवा से भी जुड़ी रहीं।

Sunday, July 26, 2009

कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि, ये मेरे वतन के लोगो जरा याद करो कुर्बानी


कारगिल युद्ध की 10वीं वर्षगांठ पर शहीदों को आज पूरा राष्ट्र नम भरी आंखों के साथ श्रद्धांजलि दे रहा है।
देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ऐसे शहीदों को मैं शेल्यूट करता हूं, जिन्होंने राष्ट्र के रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि दी। लड़ाई की वजह थी कि वर्ष 1999 की गर्मियों में जम्मू एवं कश्मीर में कारगिल की पहाडि़यों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा जमा लिया था।कारगिल की चोटियों को दुश्मन से मुक्त कराने के लिए दस साल पहले हुई लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए सेनानियों के परिजनों के आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरों पर विजय का गर्व साफ साफ झलका। उनके लाडलों ने देश के लिए अपना सर्वोत्तम बलिदान दिया था। 26 जुलाई 1999 को शुरू हुई यह लड़ाई 59 दिन तक चली। लड़ाई में भारतीय सेना ने बटालिक, कारगिल और द्रास सेक्टरों में पाकिस्तानियों की कमर बुरी तरह तोड़ दी थी। 26 जुलाई 1999 को भारतीय बलों ने अपनी विजय की घोषणा की। आज राष्ट्र कारगिल फतह को विजय दिवस के रूप में मना रहा है।10 साल पहले युद्ध में सेना के 610 अधिकारियों और कर्मियों ने बलिदान दिया जिनमें वायु सेना के पांच कर्मी तथा दो नागरिक भी शामिल थे। कारगिल लड़ाई विश्व के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में से एक में लड़ी गई जिसके चलते भारत के लोग इस तरह एक होकर खड़े हो गए कि ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया। उस समय उमड़े राष्ट्रभक्ति के अपार ज्वार से देश मजबूत हुआ। भारतीय सेना दुश्मन के छक्के छुड़ाने में सक्षम है। मुझे अपनी सेना पर गर्व है। लेकिन मैं इतना ही कहूंगा कि जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी,ये मेरे वतन के लोगो, जरा आंख में भर लो पानी।

Wednesday, July 22, 2009

सूर्य को ढक लिए जाने की अद्भुत घटना


गुजरात से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक के कई शहर आज सूर्योदय के कुछ समय बाद ही सूर्य ग्रहण के पूर्णता पर पहुंचते ही अंधेरे में डूब गए।पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा के आ जाने के कारण खग्रास सूर्य ग्रहण की आकाशीय घटना घटित होते ही लोग रोमांचित हो उठे। असम के डिब्रूगढ़ में इकट्ठा हुए खगोलविद और आम लोगों ने सुबह 6:31 बजे से लेकर 6:34 बजे तक इस आकाशीय नजारे का लुत्फ लिया। लेकिन बिहार के तारेगना में लोग इतने भाग्यशाली नहीं रहे क्योंकि बादलों के कारण सूर्य पूरी तरह ढका हुआ था। इस स्थान को इस सदी के सबसे लंबे सूर्य ग्रहण को देखने के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थानों में से एक माना गया था। यह आकाशीय नजारा सुबह 5:45 बजे शुरू हुआ और इसे देखने के लिए देश भर के अधिकांश हिस्सों के लोग सुबह सवेरे जाग गए थे। इसका समापन 7:24 बजे हुआ। दिल्ली में बादल लुका छिपी खेलते रहे लेकिन सूर्य ग्रहण को देखने के लिए हजारों लोग अनेक स्थानों पर इकट्ठा हुए थे। बताया गया था कि शहर में सूर्य का 85 प्रतिशत हिस्सा चंद्रमा ढक लेगा। राजधानी में 6:26 बजे पर हंसिए जैसी आकृति लिए सूर्य का अधिकतम 83 प्रतिशत हिस्सा ढक चुका था। गुजरात में सुबह साढ़े छह बजे चंद्रमा ने सूर्य को पूरी तरह ढक लिया और खग्रास की इस स्थिति को कुछ मिनटों के अंतराल पर विभिन्न शहरों में देखा गया। गौरतलब है कि आज का यह सूर्य ग्रहण इस सदी का सबसे लंबे समय तक देखे जाने वाला ग्रहण था और इस दौरान आसमान में चांद के सूर्य को अपने आगोश में ले लेने के कारण यह छह मिनट 39 सेकेंड तक नजरों से ओछल रहा। इससे अधिक अवधि का सूर्य ग्रहण अब अगली सदी में 13 जून 2132 को देखना संभव होगा। कई स्थानों पर पूर्ण सूर्य ग्रहण देखने के लिए इकट्ठा हुए लोग मायूस थे क्योंकि आसमान में बादल छाए रहने के कारण उन्हें ब्रह्मांड का यह अद्भुत नजारा देखने को नहीं मिला। नासा ने खग्रास सूर्य ग्रहण देखने के लिए बिहार के तारेगना को देश का सर्वश्रेष्ठ स्थल करार दिया था। यहां मौजूद लोगों को भी मायूसी का सामना करना पड़ा क्योंकि बादलों ने उन्हें इस खगोलीय नजारे से वंचित कर दिया। गुजरात में बुधवार सुबह पूर्ण सूर्यग्रहण को देखने के उत्सुक वैज्ञानिकों, पर्यटकों और स्कूली बच्चों को घने बादल छा जाने की वजह से मायूस होना पड़ा।सूरत में सुबह के समय 6.25 बजे से 6.27 के बीच कुछ अंधकार महसूस किया गया लेकिन घने बादल की वजह से पूर्ण सूर्य ग्रहण नहीं दिखा। मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में छाए बादलों ने सदी के सबसे बडे़ सूर्यग्रहण के नजारे को देखने से लोगों को वंचित कर दिया। वहीं कुछ स्थानों पर लोगों ने बनती हुई डायमंड रिंग देखी और कुछ समय के लिए तो सुबह के वक्त रात के नजारे का एहसास भी किया गया। कोलकाता में आज सुबह आकाश में बादल छाए होने के बावजूद पूर्ण सूर्य ग्रहण का 91 फीसद नजारा देखा गया। सदी के सबसे लंबे समय तक रहने वाले खग्रास सूर्य ग्रहण को सिक्किम में आज सुबह भारी बारिश के कारण लोग नहीं देख पाए। पूर्ण सूर्यग्रहण के चलते असम का डिब्रूगढ़ सूर्याेदय के कुछ समय बाद ही एक बार फिर अंधेरे में समा गया। डिब्रूगढ़ में लोगों ने सूर्य ग्रहण का नजारा देखा। डिब्रूगढ़ में सूर्य ग्रहण छह बजकर 31 मिनट पर शुरु हुआ कि छह बजकर 34 मिनट तक रहा। शताब्दी का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण आज पांच बजकर 46 मिनट पर शुरु हुआ लेकिन घने बादलों के चलते सूर्य ग्रहण के नजारे को नहीं देखा जा सका।
इक्कीसवीं सदी के सबसे लंबे समय तक होने वाले पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान प्रयोग और अध्ययन करने के अनूठे मौके का इस्तेमाल करने के लिए वैज्ञानिकों ने कोई मौका नहीं छोड़ा। इस पूर्ण ग्रहण को वैज्ञानिकों ने जीवन में सिर्फ एक बार घटित होने वाली खगोलीय घटना करार दिया है। जैसे ही सूर्य ग्रहण की शुरूआत हुई, सभी खगोलविदों ने अपनी दूरबीनों को आसमान की ओर केन्द्रित कर दिया ताकि वे चंद्रमा द्वारा सूर्य को ढक लिए जाने की इस अद्भुत घटना के एक एक लम्हे को देख सकें। इनमें से अनेक बिहार के तरेगना में इकट्ठा थे जिसे नासा ने इस घटना को देखने का सर्वश्रेष्ठ स्थान करार दिया था जबकि अन्य मध्य प्रदेश के कटनी की पहाडि़यों पर चढ़े हुए थे। यहां तक कि वाराणसी के विश्व प्रसिद्ध घाटों पर भी उन्होंने अपने साजो सामान के साथ मोर्चा जमाया हुआ था।

Tuesday, July 21, 2009

कल रूबरू होंगे लोग: शहर के हिसाब से समय भी अलग


चांद सितारों की दुनिया में दिलचस्पी रखने वाले तमाम लोगों का इंतजार कल खत्म हो जाएगा जब भोपाल, पटना, गया, वाराणसी, सूरत, उज्जैन, इंदौर, बड़ोदरा, सिलीगुडी, दार्जिलिंग जैसे शहरों में पूर्ण सूर्यग्रहण जबकि देश के अधिकांश क्षेत्रों में आंशिक सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा। गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा जा सकेगा जबकि शेष भारत के लोग भी आंशिक सूर्यग्रहण को देख सकेंगे। मानसून का समय होने तथा क्षितिज पर सूर्योदय के समय दृश्यता कम रहने के कारण भारत में सभी स्थानों पर सूर्यग्रहण दिखने में संदेह है। देश की विभिन्न खगोलीय संस्थाओं के ब्यौरे के अनुसार भोपाल में सूर्य ग्रहण सूर्योदय के साथ ही शुरू हो जाएगा, हालांकि पूर्ण सूर्यग्रहण छह बजकर 22 मिनट 11 सेंकेण्ड पर शुरू होकर छह बजकर 25 मिनट 23 सेकेंण्ड पर समाप्त होगा। इसी प्रकार, पटना में सूर्यग्रहण सुबह पांच बजकर 29 मिनट 57 सेकेंण्ड पर शुरू होगा जबकि पूर्ण सूर्यग्रहण छह बजकर 24 मिनट 37 सेकेंण्ड पर शुरू होकर छह बजकर 28 मिनट 24 सेकेंण्ड पर समाप्त होगा। वाराणसी में सूर्यग्रहण पांच बजकर 30 मिनट 03 सेकेंण्ड पर शुरू होगा हालांकि पूर्ण सूर्यग्रहण छह बजकर 24 मिनट 10 सेकेंण्ड पर शुरू होगा और छह बजकर 27 मिनट 17 सेकेंण्ड पर समाप्त होगा।गया में सूर्यग्रहण सुबह पांच बजकर 29 मिनट 34 सेकेंण्ड पर शुरू होगा जबकि पूर्ण सूर्यग्रहण छह बजकर 24 मिनट 26 सेकेंण्ड पर शुरू होकर और छह बजकर 27 मिनट 41 सेकेंण्ड पर समाप्त होगा। सूरत में सूर्यग्रहण की शुरूआत सूर्योदय से पूर्व होगी हालांकि लोग पूर्ण सूर्य ग्रहण छह बजकर 21 मिनट 16 सेकेंण्ड पर शुरू होने के बाद छह बजकर 24 मिनट 33 सेकेंण्ड तक देख सकेंगे। इसी प्रकार उज्जैन में सूर्यग्रहण की शुरूआत तो सूर्योदय से पूर्व होगी लेकिन पूर्ण सूर्यग्रहण छह बजकर 22 मिनट 51 सेकेंण्ड पर देखा जा सकेगा और यह छह बजकर 24 मिनट 30 सेकेंण्ड पर समाप्त होगा। बड़ोदरा में सूर्यग्रहण सूर्योदय से पहले से शुरू हो जाएगा जबकि पूर्ण सूर्यग्रहण का नजारा छह बजकर 22 मिनट 41 सेकेंण्ड पर देखा जा सकेगा और यह छह बजकर 23 मिनट 59 सेकेंण्ड पर खत्म होगा। सिलीगुड़ी में पूर्ण सूर्यग्रहण छह बजकर 26 मिनट 33 सेकेंण्ड पर शुरू होगा और छह बजकर 30 मिनट 23 सेकेंण्ड पर समाप्प्त हो जाएगा। दार्जिलिंग में पूर्ण सूर्यग्रहण छह बजकर 27 मिनट 01 सेकेंण्ड पर शुरू होने के बाद छह बजकर 29 मिनट 58 सेकेंण्ड पर समाप्त होगा। इसके अतिरिक्त खंडवा, मैहर, मिर्जापुर, मुजफ्फरपुर, पंचमढ़ी, पूर्णिया, रीवा, सागर, विदिशा, भरूच, कूचबिहार, कटिहार, दरभंगा, गंगटोक, बांकीपुर, सिलवासा, दमन, इटारसी, इटानगर, डिब्रूगढ़, जबलपुर जैसे इलाकों में पूर्ण सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा। हालांकि खगोलविदों का कहना है कि मानसून का समय होने के कारण भारत में सभी स्थानों पर सूर्यग्रहण देखे जाने में संदेह है लेकिन कई ऐसे स्थान हो सकते हैं जहां क्षितिज बादलों से मुक्त हो और सौभाग्यशालियों को इसका सुंदर नजारा देखने को मिले।यह वर्ष 2114 तक होने वाले ग्रहणों में दीर्घतम पूर्ण सूर्यग्रहण होगा, जो देश के पश्चिम तट से आरंभ होकर नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, जापान से होता हुआ प्रशांत महासागर में समाप्त होगा।

सूर्यग्रहण के दौरान खुलेगा गामा किरणों की बदलती तीव्रता का भेद


इक्कीसवीं सदी के सबसे लंबे पूर्ण सूर्यग्रहण के दौरान भारतीय वैज्ञानिक 22 जुलाई को गामा किरणों की बदलती तीव्रता की गुत्थी सुलझाने की कोशिश करेंगे। यह खास प्रयोग देश के दो शहरों-इंदौर और सिलीगुड़ी में एक साथ किया जा रहा है। इसके जरिए वैज्ञानिक पता लगाएंगे कि दुर्लभ खगोलीय घटना के दौरान गामा किरणों की तीव्रता में कितना बदलाव आता है। इंदौर में इस प्रयोग का साक्षी राजा रमन्ना सेंटर फार एडवांस्ड टेक्नालाजी बन रहा है। इसमें टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च :मुंबई: और जेसी बोस इंस्टीट्यूट :कोलकाता: के वैज्ञानिक भी भाग ले रहे हैं। पूर्ण सूर्यग्रहण के दौरान गामा किरणों की तीव्रता में परिवर्तन का पता लगाने के लिए आरआरकैट में सोडियम आयोडाइड डिटेक्टर जैसे विकिरण मापी यंत्र तैनात किए गए हैं। इस दौरान गामा किरणों के साथ-साथ आवेशित कणों और न्यूट्रान की तीव्रता में बदलाव की भी थाह ली जाएगी।प्रयोग से जुड़े वैज्ञानिक पिछले दस दिनों से यहां लगातार गामा किरणों की तीव्रता के आंकड़े जमा कर रहे हैं। इनकी तुलना पूर्ण सूर्यग्रहण के दौरान मिलने वाले आंकड़ों से की जाएगी।पूर्ण सूर्यग्रहण के दौरान इंदौर और सिलीगुड़ी से मिलने वाले आंकड़ों का संयुक्त विश्लेषण किया जाएगा। सिलीगुड़ी में प्रयोग की कमान टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च और नार्थ बंगाल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के हाथों में है।पिछले पूर्ण सूर्यग्रहणों के वक्त गामा किरणों की तीव्रता में विविधता पाई गई है। यह किरणें वायुमंडल में उच्च ऊर्जा वाली कास्मिक किरणों की आपसी क्रिया से उत्पन्न होती हैं।

Monday, July 20, 2009

सूर्यग्रहण मेले के लिए सजी धर्मनगरी कुरुक्षेत्र

धर्मनगरी कुरुक्षेत्र 22 जुलाई को पड़ने वाले सूर्यग्रहण मेले के लिए तैयार है। ब्रह्मसरोवर एवं सन्निहित सरोवर में स्नान कर श्रद्धालु पुण्य कमा सकेंगे। साथ ही यहां आने वाले लोगों के लिए तारामंडल में सूर्यग्रहण देखने का प्रबंध किया गया है। प्रशासन ने सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। हरियाणा स्थित धर्मनगरी कुरुक्षेत्र का अपना अलग ही महत्व है। यहां दूर-दूर से लोग आते हैं। सूर्यग्रहण के दौरान ब्रह्मसरोवर घाट में प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पवित्र स्नान के लिए आएंगे। इसके अलावा दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मूलचंद गर्ग भी स्नान के लिए पहुंचेंगे। प्रशासन ने मेले में वीआईपी एवं वीवीआईपी की एंट्री के लिए अलग रूट रखे हैं। पुलिसकर्मियों की चप्पे-चप्पे पर नजर होगी।उधर, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए श्रीकृष्ण संग्रहालय 21 जुलाई को सुबह आठ बजे से लेकर 22 जुलाई रात आठ बजे तक खुला रहेगा। यहां आने वाले श्रद्धालु जैसे ही किसी झांकी के सामने जाएंगे उस पर लगे सेंसर के संपर्क में आने से उसकी लाइट जलेगी। साथ ही लगे साउंड सिस्टम से उसका पूरा ब्योरा सुनाया जाएगा। मेले को देखते हुए पैनोरमा एवं विज्ञान केंद्र भी साढ़े 36 घंटे तक लगातार खुला रखा जाएगा। कल्पना चावला तारामंडल दर्शकों के लिए भी पूरी तरह तैयार है। तारामंडल में श्रद्धालुओं को सोलर फिल्टर से सूर्यग्रहण दिखाने का प्रबंध किया गया है।

सूर्यग्रहण देखने को जुटेंगे विश्व भर से लाखों सैलानी

भारतीय खगोलविद आर्यभट्ट ने तारों की गति के अध्ययन के लिए लगभग एक हजार वर्ष पूर्व जिस स्थान पर शिविर लगाया था, उसी गांव में 21वीं सदी के सबसे लंबे सूर्य ग्रहण के दर्शन के लिए बुधवार को कई लोग एक बार फिर जुटेंगे। वह स्थान है बिहार की राजधानी पटना से 30 किलोमीटर दक्षिण में तरेगना। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी इस ऐतिहासिक खगोलीय घटना को देखने के लिए इसे सबसे उपयुक्त स्थान करार दिया है। गांव के नाम का अर्थ निकालने पर लगता है कि तारों की गिनती के कारण ही इसका यह नाम पड़ा होगा। संभावना जताई जा रही है कि विश्व भर से दो लाख से अधिक वैग्यानिक, अनुसंधानकर्ता और खगोल प्रेमी सैलानी यहां सूर्यग्रहण देखने को जुटेंगे। तरेगना में तीन मिनट 48 सेकेंड से अधिक समय तक सूर्यग्रहण दिखाई देगा। बहरहाल सबसे अधिक समय तक सूर्यग्रहण का नजारा प्रशांत महासागर में छह मिनट 38 सेकेंड तक दिखाई देगा।राज्य सरकार आगंतुकों को सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराएगी। पटना में होटलों के अधिकतर कमरे पहले से ही वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं और पर्यटकों के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं।पटना के तारामंडल में लोगों में विशेष चश्मे के लिए भीड़ देखी जा रही है। चश्मे 20 रुपए में बिक रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सूर्यग्रहण सुबह साढ़े पांच बजे से शुरू होकर दो घंटे तक रहेगा।इस दुर्लभ खगोलीय घटना को लेकर दर्शनार्थियों को चिंता हो रही है। मानसून के कारण इस आकाशीय घटना की दृश्यता को लेकर वैज्ञानिक चिंतित हैं और वे सोच रहे हैं कि सूर्यग्रहण के समय आकाश साफ रहेगा या नहीं।आर्यभट्ट ने ग्रहों को देखने के लिए तरेगना में शिविर स्थापित किया था। जब उन्होंने 'आर्यभट्टीय' लिखा उस समय संभवत: वह पाटलीपुत्र में थे। यह पुस्तक गणित और खगोलविज्ञान के सिद्धांतों से संबंधित और बची हुई एक मात्र रचना है। उल्लेखनीय है कि 19 अप्रैल 1975 में तत्कालीन सोवियत संघ से भारत का पहला उपग्रह छोड़ा गया था और महान खगोलविद के नाम पर इसका नाम आर्यभट्ट रखा गया था।